भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

भाषाटीकासमेत । (२२९) अथ शारीरव्रणनिदानम् । द्विधा व्रणः स विज्ञेयः शारीरागन्तुभेदतः । दोषैराद्यस्तयोरन्यः शस्त्रादिक्षतसंभवः ॥ १ ॥ शारीर और आगन्तुक इन भेदोंसे वह व्रण दो प्रकारका है, पहिला शारीर दोषोंके कोपसे होय है और दूसरा शस्त्रादि करके घावके होनेसे होता है ॥ वातिकव्रण । स्तब्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्रावो महारुजः । तुद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मारुतसंभवः ॥ २ ॥ बादीसे प्रगट व्रणमें जकडना तथा हाथके छूनेसे कठिन मालूम होय, उसमेंसे थोडा स्राव होय तथा पीडा बहुत होय सुईके चुभनेकीसी पीडा होय तथा फडकना होय और उसका रंग नीला होय ॥ पित्तव्रणके लक्षण । तृष्णामोहज्वरक्लेददाहदुष्ट्यवदारणैः । व्रणं पित्तकृतं विद्याद्गन्धैः स्रावैश्च पूतिकैः ॥ ३ ॥ प्यास, मोह, ज्वर, क्लेद, दाह, सडना चिदासा होय, बास आवै, दुर्गन्धयुक्त स्राव होय, ये पित्तव्रणके लक्षण हैं ॥ कफव्रणके लक्षण । बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः । पाण्डुवर्णोऽल्पसंक्लेदी चिरपाकी कफोद्भवः ॥ ४ ॥ कफका स्राव अत्यन्त गाढा, भारी, चिकना, निश्चल, मन्द पीडा, पीला रंग, थोडा स्रवनेवाला और बहुत कालमें पके ॥ रक्तजद्वन्द्वजव्रण । रक्तो रक्तस्रुती रक्ताद्वित्रिजः स्यात्तदन्वयैः ॥ ५ ॥ जो रक्तके कोपसे व्रण होय वह रक्तवर्ण, उसमेंसे रुधिर स्रवे । एक दोष और रुधिरके सम्बन्धसे जो होय वह द्वन्द्व और दो दोष अथवा तीन दोष तथा रुधिर १ “ व्रण गात्रविचूर्णने ” इत्यस्माद्धातोर्व्रणस्य साधुत्वम् । व्रणनिरुक्तिश्च सुश्रुते-“व्रणोति यस्माद्रूढेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति । आदेहधारणाज्जन्तोर्व्रणस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ” इति ॥