माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० वक्र और दो प्रकारके छिन्न । १ कर्कटक-अर्थात् हाड दोनों ओरसे दबकर बीचमें ऊंचासा होय । २ अश्वकर्ण-घोडेके कानके समान जो हाड हो जाय । ३-विचूर्णित चुरकट होगया हो, वह शब्दसे अथवा स्पर्शसे जाना जाय । ४ पिच्चित- पिचा भया हाड । ५ अस्थिछल्लिका-हाडका कोई भाग छिलकेके समान उखड कर रहा है सो । ६ कांडभग्न-हड्डीका कांड टूटना । ७ अतिपात-सब हाड टूटे सो । ८ मज्जागत--हड्डीके अवयव मज्जामें प्रवेश कर मज्जाको बाहर निकाले । ९ स्फुटित-- जिस हड्डीके बहुत टुकटे होजायँ । १० वक्र-हड्डी तिरछी होजाय वह भी भग्नमें गिनी जाती है । ११-१२ छिन्न-१ बारीक बारीक बहुतसे टुकडे होजायँ सो और दूसरा एक ओरसे टूटकर दूसरी तरफ निकले है ॥ कांडभग्नके सामान्य लक्षण । -स्रस्तांगता शोथरुजातिवृद्धिः । सम्पीड्यमाने भवतीह शब्दः स्पर्शासहस्पंदनतोदशूलाः ॥ ५ ॥ सर्वास्ववस्थासु न शर्मलाभो भग्नस्य काण्डे खलु चिह्नमेतत् । अंगोंमें शिथिलता, सूजन, घोर पीडा, जिस स्थानकी हड्डी टूटी होय उसजगह पीडाके साथ शब्द होय, हाथके लगानेसे सहा न जाय, हड्डी फडके, सुई छेदने- कीसी पीडा होय और शूल होय, कभी चैन न पडे । ‘कांड’ इस शब्दसे, नलक, कपाल, वलय, तरुण और रुचक इन पांच प्रकारकी हड्डियोंका संग्रह होय है ॥ कांड भग्नके ( १२ ) बारह भेदोंसे अधिक भेद होते हैं उतको कहते हैं । भग्नं तु कांडे बहुधा प्रयाति समासतो नामभिरेव तुल्यम् ॥ ६ ॥ कांडोंमें अनेक प्रकारके भंग होते हैं, सो जिस ठिकाने जैसी आकृतिका होय उसका उसी प्रकारका नाम कहना चाहिये ॥ कष्टसाध्यके लक्षण । अल्पाशिनोऽनात्मवतो जन्तोर्वातात्मकस्य च । उपद्रवैर्वा जुष्टस्य भग्नं कृच्छ्रेण सिध्यति ॥ ७ ॥ थोडा खानेवाला और जिसकी इन्द्रिय स्वाधीन न होय वात प्रकृतिवालेकी ज्वरादि उपद्रवसंयुक्त ऐसे पुरुषकी हड्डी टूटनेसे बडे कष्टसे साध्य होती है ॥ असाध्य लक्षण । भिन्नं कपालं कट्यां तु संधिमुक्तं तथा च्युतम् । जघनं प्रतिपिष्टं च वर्जयेत्तु विचक्षणः ॥ ८ ॥