BharatKosha
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

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( ८ ) माधवनिदान । औषध सोंठ हुई ऐसे ही हेतुविपरीत अन्न जैसे श्रम और वातसे प्रगट ज्वरोंमें मांसका रस और चावल इसमें हेतु कौन कि, श्रम और वात ये कब शान्त होंय कि, श्रम और वात हरणकर्त्ता पथ्य मिलै ऐसा पथ्य कौन कि, मांसरस और चावलोंका भात ये श्रम और वातके विपरीत हैं अर्थात् नाशक हैं ऐसे ही हेतुविपरीतविहार कहिये आचरण कौन जैसे दिनके सोनेसे प्रगट कफपर रातमें जागना, यहां हेतु कौन भया कि, दिनका सोना उसके प्रगट दोष कौन कि कफ, यह कफ कब शान्त होय कि, जिस हेतुसे प्रगट भया उस हेतुसे विपरीत आचरण करा जाय तो दिनके सोनेपर उलटा आचरण कौन कि, रातमें जागना, तो यह हेतुविपरीत आचरण भया । इसी प्रकार और उदाहरण व्याधिविपरीत आदिके लिखे हुए चक्रके अनुसार बुद्धिमान् मनुष्य समझ लेवेंगे ॥ अनुपशयके लक्षण । विपरीतोऽनुपशयो व्याध्यसात्म्यमिति स्मृतः ॥ ९ ॥ जो उपशयके लक्षण कहे हैं उससे विपरीत लक्षण अनुपशयके हैं और व्याधिका असात्म्य अर्थात् असमान नाम उसी अनुपशयका पर्यायवाचक शब्द है ॥ सम्प्राप्तिके लक्षण । यथा दुष्टेन दोषेण यथा चानुविसर्पता । निवृत्तिरामयस्याऽसौ सम्प्राप्तिर्जातिरागतिः ॥ १० ॥ दोष कहिये वात पित्त कफ इनका दुष्ट होना नाम कुपित होना अनेक प्रका- रका है अर्थात् स्वकारण या दूसरेके कारण करके ऐसे कुपित दोष अपने स्थानको छोड़कर देहमें ऊपर नीचे तिरछे विचरते हैं उस विचरनेसे जो रोग प्रगट हो उसको सम्प्राप्ति कहते हैं और जाति तथा आगति ये दोनों पर्यायवाचक नाम उसी सम्प्रा- प्तिकें हैं । तात्पर्यार्थ यह है कि, मनुष्यके देहमें वात पित्त कफ ये सम्पूर्ण दोष बढकर जैसे रोगको प्रगट करें तैसे ही उसको सम्प्राप्ति कहते हैं । उदाहरण-जैसे कुपितदोषोंका आमाशयमें प्रवेश होनेसे और स्थानमें इतस्ततो गमन करनेसे तथा रसकी बहनेवाली नाडियोंके मार्गोंको रोकनेसे और पक्वाशयमें रहनेवाली अग्निको बाहर निकालनेसे तथा उसी जठर अग्निसे सर्व देहके तप्त होनेसे यह ज्वर है, ऐसा जो निश्चय कह्या जाय है उसीको सम्प्राप्ति कहते हैं, ऐसे ही अतिसारादि रोगोंकी सम्प्राप्ति जाननी चाहिये ॥ सम्प्राप्तिके भेद । संख्याविकल्पप्राधान्यबलकालविशेषतः । अब सम्प्राप्तिके भेद कहते हैं सो कहिये सो सम्प्राप्ति संख्यादि विशेषण पांच प्रकारकी है जैसे-१ संख्या, २ विकल्प, ३ प्राधान्य, ४ बल, ५ काल इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA