भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ११ ) रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते । प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ॥ १७ ॥ अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते । ( दिवास्वापादिदोषैश्च प्रतिश्यायश्च जायते । ) प्रतिश्यायादथो कासः कासात्संजायते क्षयः ॥ १८ ॥ क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते । कोई प्रश्न करे कि, जो पूर्व कह आये हैं यह ही निदान है अथवा इसके व्यति- रिक्त और, इसलिये कहते हैं रोगका रोग भी निदान होता है अर्थात् जो निदानसे कार्य होता है वह ही रोगसे भी होता है. इसवास्ते दृष्टांत देकर कहते हैं-“तद्यथेति” जैसे ज्वरसन्तापसे रक्तपित्त प्रगट होता है और रक्तपित्तसे ज्वर और रक्तपित्त- ज्वरसे श्वास प्रगट होता है और प्लीहाके बढनेसे जैसे उदररोग और उदररोगसे सूजन और बवासीरसे जैसे उदररोग और गुल्म ( गोला ) रोग, दिनमें सोने आदि- कोंसे जुकाम होता है और जुकामसे खांसी तथा खांसीसे ओजप्रभृति धातुओंका क्षय होता है, यह क्षयरोग ( राजयक्ष्मा ) सम्पूर्ण रोगोंमें राजा है इसको प्रगट करते हैं ॥ ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ॥ १९ ॥ वे रोग प्रथम स्वतन्त्र होते हैं और पीछे जब बल मिलगया तो वेही हेत्वर्थकारी अर्थात् रोगके उत्पन्न करनेवाले होते हैं जैसे ज्वरसे रक्तपित्त होता है ॥ कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति । न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥ एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसङ्कराः ॥ २० ॥ अब उसी रोग उत्पन्न करनेवाली व्याधिकी विचित्रता दिखाते हैं, जैसे कोई एक रोग दूसरेका कारण हो अर्थात् दूसरे रोगको प्रगट कर आप शांत हो जाता है जैसे ज्वरके सन्तापसे रक्तपित्त होता है उस समय ज्वर दूर होजाय और रक्त- पित्त रह जावे और कोई रोग दूसरे रोगको प्रगट कर आप जैसाका तैसा बना रहता है जैसे बवासीर नहीं जाय और गुल्म तथा उदररोग पैदा होते हैं । इस प्रकार मनुष्योंके घोर क्लेशदायक मिलेहुए रोग देखनेमें आते हैं । विशेष करके चिकित्सा विरुद्ध होनेसे ये रोग कृच्छ्रतम होते हैं ॥

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