माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २९७ ) मांससंघातके लक्षण । दुष्टं मांसं नीरुजं तालुमध्ये कफाच्छूनं मांससङ्घातमाहुः । कफकरके तालुमें मांस दुष्ट होकरके जो सूजन होय और वह दूखे नहीं उसको मांससंघात कहते हैं ॥ तालुपुप्पुटके लक्षण । नीरुक्स्थायी कोलमात्रःकफात्स्यान्मेदोयुक्तःपुप्पुटस्तालुदेशे॥४०॥ मेदयुक्त कफकरके तालुमें पीडारहित और स्थिर तथा बेरके समान सूजन होय उसको तालुपुप्पुट कहते हैं ॥ तालुशोषके लक्षण । शोषोऽत्यर्थं दीर्यते चापि तालु श्वासश्चोग्रस्तालुशोषोऽनिलाच्च । वादीसे तालु अत्यन्त सूखकर फट जाय, तथा भयंकर श्वास होय उसको तालु- शोष कहते हैं ॥ तालुपाकके लक्षण । पित्तं कुर्यात्पाकमत्यर्थघोरं तालुन्येवं तालुपाकं वदंति ॥ ४१ ॥ पित्त कुपित होकर तालुमें अत्यन्त भयंकर पाक ( पकी फुन्सी ) उत्पन्न करे उसको तालुपाक कहते हैं ॥ कण्ठगत १७ रोग । तिनमें पांच रोहिणीकी सामान्य सम्प्राप्ति । गलेऽनिलःपित्तकफौच मूर्च्छितौ प्रदूष्य मांसं च तथैव शोणितम् । गलोपसंरोधकरैस्तथांकुरैर्निहंत्यसूनव्याधिरयं हि रोहिणी ॥ ४२ ॥ गलेमें वायु पित्त और कफ ये दुष्ट होकर मांसको तथा रुधिरको दूषित कर गलेमें अंकुर ( कांटे ) उत्पन्न करे हैं, उनसे गला रुकजाय, यह रोहिणीनामक व्याधि प्राणनाशक है । सब रोहिणी सन्निपातसे प्रगट होती हैं । उत्कर्षके वास्ते वात- आदिका व्यपदेश है इस सबका असाध्यत्व भोजने पृथक् लिखा है ॥ वातजाके लक्षण । जिह्वासमन्ताद्भृशवेदनास्तु मांसाङ्कुराः कण्ठनिरोधना ये । सा रोहिणी वातकृता प्रदिष्टा वातात्मकोपद्रवगाढयुक्ता ॥ ४३ ॥ जीभके चारों ओर अत्यन्त वेदनायुक्त जो मांसांकुर उत्पन्न होयँ, उनसे कंठका अवरोध होय, तथा कम्प, विनाम, स्तम्भादि वातके उपद्रव होयँ ॥ १ सद्यस्त्रिदोषजं हन्ति त्र्यहाच्छ्लेष्मसमुद्भवा । पंचाह्रात्पित्तसंभूता सप्ताहात्पवनोत्थिता ॥ इति ॥