भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 404 में से

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पृष्ठ 355

भाषाटीकासमेत । ( ३३७ ) रक्तजके लक्षण । रक्तात्मकः पित्तसमानलिंगः स्पर्शासहत्वं शिरसो भवेच्च । रक्तजन्य मस्तकरोगमें पित्तकृत मस्तकरोगके सब लक्षण होते हैं तथा मस्तकके स्पर्श सहा नहीं जाय, यह विशेष होता है ॥ क्षयजके लक्षण । असृग्वसाश्लेष्मसमीरणानां शिरोगतानामिह संक्षयेण ॥ ६ ॥ क्षवप्रवृत्तिः शिरसोऽभितापः कष्टो भवेदुग्ररुजोऽतिमात्रम् । संस्वेदनच्छर्द्दनधूम्रनस्यैरसृग्विमोक्षैश्च विवृद्धिमेति ॥ ७ ॥ मस्तकके रुधिर वसा कफ और वायु इनके क्षय होनेसे अत्यन्त भयंकर मस्तक- शूल होता है, छींक बहुत आवें, मस्तक गरम होवे, कष्ट होय, अत्यन्त कठिन ( असह्य ) पीडा होय, उसमें स्वेदन, वमन, धूम्रपान, नस्य, रुधिर निकालना ये उप- द्रव करनेसे मस्तक शूल वृद्धिको प्राप्त होता है, इसको क्षयज मस्तक शूल कहते हैं ॥ कृमिजके लक्षण । निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं संभक्ष्यमाणं स्फुरतीव चान्तः । घ्राणाच्च गच्छेद्रुधिरं सपूयं शिरोभितापः कृमिभिः स घोरः ॥ ८ ॥ जिसके मस्तकमें सुईके चुभनेके समान पीडा होवे, तथा कृमि मस्तकको खा रही हो तथा मस्तकके भीतरमें फडकत्ता हुआ मालूम हो तथा नाकमें रुधिर राध और कीडे पडें यह कृमिरोग बडा भयंकर है ॥ सूर्यावर्तके लक्षण । सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमाक्षिध्रुवं रुक्समुपैति गाढा । विवर्द्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ॥ ९ ॥ शीतेन शांतिं लभते कदाचिदुष्णेन जंतुः सुखमाप्नुयाद्वा । सर्वात्मकं कष्टतमं विकारं सूर्यापवर्तं तमुदाहरंति ॥ १० ॥ सूर्यके उदय होनेसे धीरे धीरे मस्तक दुखनेका आरंभ होय और जैसे जैसे सूर्य बढे तैसे तैसे वह शूल नेत्र और भृकुटी ( भौंह ) इत्तमें दो प्रहर दिन चढे तक बढता जाय और सूर्यके साथ बढकर फिर जैसे २ सूर्य अस्त होय तैसे २ पीडा मन्द होती जाय, शीतल और गरम उपचार करनेसे मनुष्यको सुख होय, इस सान्नि- पातिक विकारको सूर्यावर्त्त कहते हैं ॥ अनंतवातके लक्षण । दोषास्तु दुष्टास्त्रय एव मन्यां संपीड्य गाढं सरुजां सुतीव्राम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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