महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1052, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें'अत्यन्त मन्दबुद्धि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र पाण्डवोंको सर्वथा विषम दृष्टिसे देखते हैं। धर्मकी ओर उनकी दृष्टि नहीं है ॥ ७ ॥ न हि पापमपापात्मा रोचयिष्यति पाण्डवः । भीमो वा बलिनां श्रेष्ठः कौन्तेयो वा धनंजयः ॥ ८ ॥ 'निष्पाप अन्तःकरणवाले पाण्डुकुमार युधिष्ठिर, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन अथवा कुन्तीनन्दन अर्जुन कभी पापसे प्रीति नहीं करेंगे ॥ ८ ॥ कुत एव महात्मानौ माद्रीपुत्रौ करिष्यतः । तान् राज्यं पितृतः प्राप्तान् धृतराष्ट्रो न मृष्यते ॥ ९ ॥ 'फिर महात्मा दोनों माद्रीकुमार कैसे पाप कर सकेंगे। पाण्डवोंको अपने पितासे जो राज्य प्राप्त हुआ था, धृतराष्ट्र उसे सहन नहीं कर रहे हैं ॥ ९ ॥ अधर्म्यमिदमत्यन्तं कथं भीष्मोऽनुमन्यते । विवास्यमानानस्थाने नगरे योऽभिमन्यते ॥ १० ॥ 'इस अत्यन्त अधर्मयुक्त कार्यके लिये भीष्मजी कैसे अनुमति दे रहे हैं? पाण्डवोंको अनुचितरूपसे यहाँसे निकालकर जो रहनेयोग्य स्थान नहीं, उस वारणावत नगरमें भेजा जा रहा है! फिर भी भीष्मजी चुपचाप क्यों इसे मान लेते हैं? ॥ १० ॥ पितेव हि नृपोऽस्माकमभूच्छांतनवः पुरा । विचित्रवीर्यो राजर्षिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः ॥ ११ ॥ 'पहले शांतनुकुमार राजर्षि विचित्रवीर्य तथा कुरुकुलको आनन्द देनेवाले महाराज पाण्डु हमारे राजा थे। केवल राजा ही नहीं, वे पिताके समान हमारा पालन-पोषण करते थे ॥ ११ ॥ स तस्मिन् पुरुषव्याघ्रे देवभावं गते सति । राजपुत्रानिमान् बालान् धृतराष्ट्रो न मृष्यते ॥ १२ ॥ 'नरश्रेष्ठ पाण्डु जब देवभाव (स्वर्ग)-को प्राप्त हो गये हैं, तब उनके इन छोटे-छोटे राजकुमारोंका भार धृतराष्ट्र नहीं सहन कर पा रहे हैं ॥ १२ ॥ वयमेतदनिच्छन्तः सर्व एव पुरोत्तमात् । गृहान् विहाय गच्छामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥ 'हमलोग यह नहीं चाहते, इसलिये हम सब घर-द्वार छोड़कर इस उत्तम नगरीसे वहीं चलेंगे, जहाँ युधिष्ठिर जा रहे हैं' ॥ १३ ॥ तांस्तथावादिनः पौरान् दुःखितान् दुःखकर्शितः । उवाच मनसा ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥ शोकसे दुर्बल धर्मराज युधिष्ठिर अपने लिये दुःखी उन पुरवासियोंको ऐसी बातें करते देख मन-ही-मन कुछ सोचकर उनसे बोले— ॥ १४ ॥ पिता मान्यो गुरुः श्रेष्ठो यदाह पृथिवीपतिः ।