भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1065

न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम् ॥ ८ ॥ तब सत्यवादी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने उससे कहा—'सौम्य! मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुम विदुरजीके हितैषी, ईमानदार, विश्वसनीय, प्रिय तथा उनके प्रति सदा अविचल भक्ति रखनेवाले हो। हमारा कोई भी ऐसा प्रयोजन नहीं है, जो परम ज्ञानी विदुरजीको ज्ञात न हो ॥ ७-८ ॥

यथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि । भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान् यथा कविः ॥ ९ ॥ 'तुम विदुरजीके लिये जैसे आदरणीय और विश्वसनीय हो, वैसे ही हमारे लिये भी हो। तुमसे हमारा कोई अन्तर नहीं है। हमलोग जिस प्रकार विदुरजीके पालनीय हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं। जैसे वे हमारी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम भी करो ॥ ९ ॥

इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः । पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १० ॥ 'यह घर आग भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है। हमारा विश्वास है कि दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनने हमारे लिये ही इसे बनवाया है ॥ १० ॥

स पापः कोषवांश्चैव ससहायश्च दुर्मतिः । अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रबाधते ॥ ११ ॥ 'पापी दुर्योधनके पास खजाना है और उसके बहुत-से सहायक भी हैं; इसीलिये वह दुर्बुद्धि पापात्मा सदा हमें सताया करता है ॥ ११ ॥

स भवान् मोक्षयत्वस्मान् यत्नेनास्माद् हुताशनात् । अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात् सुयोधनः ॥ १२ ॥ 'तुम यत्न करके हमलोगोंको इस आगसे बचा लो; अन्यथा हमलोगोंके यहाँ दग्ध हो जानेपर दुर्योधनका मनोरथ सफल हो जायगा ॥ १२ ॥

समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः । वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत् ॥ १३ ॥ इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम् । प्रागेव विदुरो वेद तेनास्मानन्वबोधयत् ॥ १४ ॥ 'यह उस दुरात्माका अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ आयुधागार है। इसीके सहारे इस महान् गृहका निर्माण किया गया है। इसमें चहारदीवारीके निकटतक कहीं कोई बाहर निकलनेका मार्ग नहीं है। अवश्य ही दुर्योधनका यह अशुभ कर्म, जिसे वह पूर्ण करना चाहता है, पहले ही विदुरजीको मालूम हो गया था। इसीलिये उन्होंने हमें इसकी जानकारी करा दी ॥ १३-१४ ॥

सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान् पुरा । पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं प्रतिमोचय ॥ १५ ॥