महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति
(वैशम्पायन उवाच
सा तानेवापतत् तूर्णं भगिनी तस्य रक्षसः ।
अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ॥
अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् ।
अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! हिडिम्बा-सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेनसे बोली।
हिडिम्बोवाच
अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता ।
क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ॥
राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् ।
अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ॥)
हिडिम्बाने कहा—(आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ।
भीमसेन उवाच
स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् ।
हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ॥ १ ॥
भीमसेन बोले— हिडिम्बे! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः ।