महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1123, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेनको साथ ले वहाँसे ऊपर आकाशमें उड़ गयी ।। २१ ।। शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ।। २२ ।। कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता । संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ।। २३ ।। तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ।। २४ ।। नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च । सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ।। २५ ।। काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । हिमवद्गिरिकुञ्जेषु गुहासु विविधासु च ।। २६ ।। प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु । सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ।। २७ ।। पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च । देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु ।। २८ ।। गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च ।। २९ ।। बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् । रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ।। ३० ।। उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्दन भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य-मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान् पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्यकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके