भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1408, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1408

तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः ॥ ७ ॥ भरतश्रेष्ठ! तुमने अधर्मपूर्वक इस राज्यको हथिया लिया है; परंतु मेरा विचार यह है कि तुमसे पहले ही वे भी इस राज्यको पा चुके थे ॥ ७ ॥

मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीयताम् । एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च ॥ ८ ॥ पुरुषसिंह! प्रेमपूर्वक ही उन्हें आधा राज्य दे दो। इसीमें सब लोगोंका हित है ॥ ८ ॥

अतोऽन्यथा चेत् क्रियते न हितं नो भविष्यति । तवाप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥ यदि इसके विपरीत कुछ किया जायगा तो हमारी भलाई नहीं हो सकती और तुम्हें भी पूरा-पूरा अपयश मिलेगा—इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं बलम् । नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् ॥ १० ॥ अतः अपनी कीर्तिकी रक्षा करो, कीर्ति ही श्रेष्ठ बल है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, उस मनुष्यका जीवन निष्फल माना गया है ॥ १० ॥

यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव । तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति ॥ ११ ॥ गन्धारीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! मनुष्यकी कीर्ति जबतक नष्ट नहीं होती, तभीतक वह जीवित है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसका तो जीवन ही नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥

तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम् । अनुरूपं महाबाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु ॥ १२ ॥ महाबाहो! कुरुकुलके लिये उचित इस उत्तम धर्मका पालन करो। अपने पूर्वजोंके अनुरूप कार्य करते रहो ॥ १२ ॥

दिष्ट्या ध्रियन्ते पार्था हि दिष्ट्या जीवति सा पृथा । दिष्ट्या पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययं गतः ॥ १३ ॥ सौभाग्यकी बात है कि कुन्तीके पुत्र जीवित हैं; यह भी सौभाग्यकी ही बात है कि कुन्ती भी मरी नहीं है और सबसे बड़े सौभाग्यका विषय यह है कि पापी पुरोचन अपने (बुरे) इरादेमें सफल न होकर स्वयं नष्ट हो गया ॥ १३ ॥

यदा प्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः । तदा प्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् ॥ १४ ॥ लोके प्राणभृतां कंचिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम् । न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत् पुरोचनम् । यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति ॥ १५ ॥

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