महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषडधिकद्विशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान
द्रुपद उवाच
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथाऽऽत्थ विदुराद्य माम् ।
ममापि परमो हर्षः सम्बन्धेऽस्मिन् कृते प्रभो ॥ १ ॥
**द्रुपद बोले—**महाप्राज्ञ विदुरजी! आज आपने जो कुछ मुझसे कहा है, सब ठीक है। प्रभो! (कौरवोंके साथ) यह सम्बन्ध हो जानेसे मुझे भी महान् हर्ष हुआ है ॥ १ ॥
गमनं चापि युक्तं स्याद् दृढमेषां महात्मनाम् ।
न तु तावन्मया युक्तमेतद् वक्तुं स्वयं गिरा ॥ २ ॥
यदा तु मन्यते वीरः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चैव यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ३ ॥
रामकृष्णौ च धर्मज्ञौ तदा गच्छन्तु पाण्डवाः ।
एतौ हि पुरुषव्याघ्रावेषां प्रियहिते रतौ ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंका अपने नगरमें जाना भी अत्यन्त उचित ही है। तथापि मेरे लिये अपने मुखसे इन्हें जानेके लिये कहना उचित नहीं है। यदि कुन्तीकुमार वीरवर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेव जाना उचित समझें तथा धर्मज्ञ बलराम और श्रीकृष्ण पाण्डवोंका वहाँ जाना उचित समझते हों तो ये अवश्य वहाँ जायँ; क्योंकि ये दोनों पुरुषसिंह सदा इनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं ॥ २–४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
परवन्तो वयं राजंस्त्वयि सर्वे सहानुगाः ।
यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या तत् करिष्यामहे वयम् ॥ ५ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! हम सब लोग अपने सेवकोंसहित सदा आपके अधीन हैं। आप स्वयं प्रसन्नतापूर्वक हमसे जैसा कहेंगे, वही हम करेंगे ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीद् वासुदेवो गमनं रोचते मम ।
यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् ॥ ६ ॥