भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1427

दुःखास्तु बहवः प्राप्ता तथा प्राणान्तिका मया । अतः परं न जानामि कर्तव्यं ज्ञातुमर्हसि ॥

कुन्ती बोली—विदुरजी! आपके पुत्र पाण्डव किसी प्रकार आपके ही कृपाप्रसादसे जीवित हैं। लाक्षागृहमें आपने इन सबके प्राण बचाये हैं और अब यह पुनः आपके समीप जीते-जागते लौट आये हैं। कछुआ अपने पुत्रोंका, वे कहीं भी क्यों न हो, मनसे चिन्तन करता रहता है। इस चिन्तासे ही अपने पुत्रोंका वह पालन-पोषण एवं संवर्धन करता है। उसीके अनुसार जैसे वे सकुशल जीवित रहते हैं, वैसे ही आपके पुत्र पाण्डव (आपकी ही मंगल-कामनासे) जी रहे हैं! भरतश्रेष्ठ! आप ही इनके रक्षक हैं। तात! जैसे कोयलके पुत्रोंका पालन-पोषण सदा कौएकी माता करती है, उसी प्रकार आपके पुत्रोंकी रक्षा मैंने की है। अबतक मैंने बहुत-से प्राणान्तक कष्ट उठाये हैं; इसके बाद मेरा क्या कर्तव्य है, यह मैं नहीं जानती। यह सब आप ही जानें!

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ता दुःखार्ता शुशोच परमातुरा । प्रणिपत्याब्रवीत् क्षत्ता मा शोच इति भारत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—यों कहकर दुःखसे पीड़ित हुई कुन्ती अत्यन्त आतुर होकर शोक करने लगी। उस समय विदुरने उन्हें प्रणाम करके कहा, तुम शोक न करो।

विदुर उवाच

न विनश्यन्ति लोकेषु तव पुत्रा महाबलाः । नचिरेणैव कालेन स्वराज्यस्था भवन्ति ते । बान्धवैः सहिताः सर्वैर्मा शोकं कुरु माधवि ॥)

विदुर बोले—यदुकुलनन्दिनी! तुम्हारे महाबली पुत्र संसारमें (दूसरोंके सतानेसे) नष्ट नहीं हो सकते। अब वे थोड़े ही दिनोंमें समस्त बन्धुओंके साथ अपने राज्यपर अधिकार करनेवाले हैं। अतः तुम शोक मत करो।

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते समनुज्ञाता द्रुपदेन महात्मना । पाण्डवाश्चैव कृष्णश्च विदुरश्च महीपते ॥ १० ॥ आदाय द्रौपदीं कृष्णां कुन्तीं चैव यशस्विनीम् । सविहारं सुखं जग्मुर्नगरं नागसाह्वयम् ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर महात्मा द्रुपदकी आज्ञा पाकर पाण्डव, श्रीकृष्ण और विदुर द्रुपद-कुमारी कृष्णा और यशस्विनी कुन्तीको साथ ले आमोद-प्रमोद करते हुए हस्तिनापुरकी ओर चले ॥ १०-११ ॥