महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1428, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें(सुवर्णकक्ष्याग्रैवेयान् सुवर्णाङ्कुशभूषितान् । जाम्बूनदपरिष्कारान् प्रभिन्नकरटामुखान् ।। अधिष्ठितान् महामात्रैः सर्वशस्त्रसमन्वितान् । सहस्रं प्रददौ राजा गजानां वरवर्णिनाम् ।। रथानां च सहस्रं वै सुवर्णमणिचित्रितम् । चतुर्युजां भानुमच्च पञ्चानां प्रददौ तदा ।। सुवर्णपरिबर्हाणां वरचामरमालिनाम् । जात्यश्वानां च पञ्चाशतसहस्रं प्रददौ नृपः ।। दासीनामयुतं राजा प्रददौ वरभूषणम् । ततः सहस्रं दासानां प्रददौ वरधन्विनाम् ।। हैमानि शय्यासनभाजनानि द्रव्याणि चान्यानि च गोधनानि । पृथक् पृथक् चैव ददौ स कोटिं पाञ्चालराजः परमप्रहृष्टः ।। शिबिकानां शतं पूर्णं वाहान् पञ्चशतं नरान् । एवमेतानि पाञ्चालो कन्यार्थे प्रददौ धनम् ।। हरणं चापि पाञ्चाल्या ज्ञातिदेयं तु सौमकिः । धृष्टद्युम्नो ययौ तत्र भगिनीं गृह्य भारत ।। नानद्यमाने बहुभिस्तूर्यशब्दैः सहस्रशः ।।)
उस समय राजा द्रुपदने उन्हें एक हजार सुन्दर हाथी प्रदान किये, जिनकी पीठोंपर सोनेके हौदे कसे हुए थे और गलेमें सोनेके आभूषण शोभा पा रहे थे। उनके अंकुश भी सोनेके ही थे। जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उन सबको सजाया गया था। उनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी। बड़े-बड़े महावत उन सबका संचालन करते थे। वे सभी गजराज सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। राजाने पाँचों पाण्डवोंके लिये चार घोड़ोंसे जुते हुए एक हजार रथ दिये, जो सुवर्ण और मणियोंसे विभूषित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करते थे और सब ओर अपनी प्रभा बिखेर रहे थे। इतना ही नहीं, राजाने अच्छी जातिके पचास हजार घोड़े भी दिये, जो सुनहरे साज-बाजसे सुसज्जित और सुन्दर चँवर तथा मालाओंसे अलंकृत थे। इनके सिवा सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित दस हजार दासियाँ भी दीं। साथ ही उत्तम धनुष धारण करनेवाले एक हजार दास पाण्डवोंको भेंट किये। बहुत-सी शय्याएँ, आसन और पात्र भी दिये जो सब-के-सब सुवर्णके बने हुए थे। दूसरे-दूसरे द्रव्य और गोधन भी समर्पित किये। इन सबकी पृथक्-पृथक् संख्या एक-एक करोड़ थी। इस प्रकार पांचालराज द्रुपदने बड़े हर्ष और उल्लासके साथ पाण्डवोंको उपर्युक्त वस्तुएँ अर्पित कीं। सौ पालकियाँ और उनको ढोनेवाले पाँच सौ कहार दिये। इस प्रकार पांचालराजने