महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1523, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकांश्चिदभ्यवदत् प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादितः ॥ ४३ ॥ कुछ लोगोंका उन्होंने गुरुकी भाँति पूजन किया, कितनोंको समवयस्क मित्रोंकी भाँति गलेसे लगाया, कुछ लोगोंसे प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और कुछ लोगोंने उन्हींको प्रणाम किया ॥ ४३ ॥
तेषां ददौ हृषीकेशो जन्यार्थे धनमुत्तमम् । हरणं वै सुभद्राया ज्ञातिदेयं महायशाः ॥ ४४ ॥ महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्णने वधू तथा वरपक्षके लोगोंके लिये उत्तम धन अर्पित किया। वरके कुटुम्बीजनोंको देनेयोग्य दहेज पहले नहीं दिया गया था, उसीकी पूर्ति उन्होंने इस समय की ॥ ४४ ॥
रथानां काञ्चनाङ्गानां किङ्किणीजालमालिनाम् । चतुर्युजामुपेतानां सूतैः कुशलशिक्षितैः ॥ ४५ ॥ सहस्रं प्रददौ कृष्णो गवामयुतमेव च । श्रीमान् माथुरदेश्यानां दोग्ध्रीणां पुण्यवर्चसाम् ॥ ४६ ॥ किंकिणी और झालरोंसे सुशोभित सुवर्णखचित एक हजार रथ जिनमेंसे प्रत्येकमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे और प्रत्येकमें पूर्ण शिक्षित चतुर सारथि बैठा हुआ था, श्रीमान् कृष्णने समर्पित किये तथा मथुरामण्डलकी पवित्र तेजवाली दस हजार दुधारू गौएँ दीं ॥ ४५-४६ ॥
वडवानां च शुद्धानां चन्द्रांशुसमवर्चसाम् । ददौ जनार्दनः प्रीत्या सहस्रं हेमभूषितम् ॥ ४७ ॥ चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिवाली विशुद्ध जातिकी एक हजार सुवर्णभूषित घोड़ियाँ भी जनार्दनने प्रेमपूर्वक भेंट कीं ॥ ४७ ॥
तथैवाश्वतरीणां च दान्तानां वातरंहसाम् । शतान्यञ्जनकेशीनां श्वेतानां पञ्च पञ्च च ॥ ४८ ॥ इसी प्रकार पाँच सौ काले अयालवाली और पाँच सौ सफेद रंगवाली खच्चरियाँ समर्पित कीं, जो सभी वशमें की हुई तथा वायुके समान वेगवाली थीं ॥ ४८ ॥
स्नानपानोत्सवे चैव प्रयुक्तं वयसान्वितम् । स्त्रीणां सहस्रं गौरीणां सुवेषाणां सुवर्चसाम् ॥ ४९ ॥ सुवर्णशतकण्ठीनामरोमाणां स्वलंकृताम् । परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः ॥ ५० ॥ स्नान, पान और उत्सवमें जिनका उपयोग किया गया था, जो वयःप्राप्त थीं, जिनके वेष सुन्दर और कान्ति मनोहर थी, जिन्होंने सोनेके सौ-सौ मणियोंकी कण्ठियाँ पहन रखी थीं, जिनके शरीरमें रोमावलियाँ नहीं प्रकट हुई थीं, जो वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा सेवाके