महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1525, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिजग्राह तत् सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिरः । पूजयामास तांश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथान् ॥ ५८ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने वह सारा धन ग्रहण किया और वृष्णि तथा अन्धकवंशके उन सभी महारथियोंका भलीभाँति आदर-सत्कार किया ॥ ५८ ॥
ते समेता महात्मानः कुरुवृष्ण्यन्धकोत्तमाः । विजहुरमरावासे नराः सुकृतिनो यथा ॥ ५९ ॥ जैसे पुण्यात्मा मनुष्य देवलोकमें सुख भोगते हैं, उसी प्रकार कुरु, वृष्णि और अन्धकवंशके वे श्रेष्ठ महात्मा पुरुष एकत्र होकर इच्छानुसार विहार करने लगे ॥ ५९ ॥
तत्र तत्र महानादैरूत्कृष्टतलनादितैः । यथायोगं यथाप्रीति विजहुः कुरुवृष्णयः ॥ ६० ॥ वे कौरव और वृष्णिवंशके वीर जहाँ-तहाँ वीणाकी उत्तम ध्वनिके साथ गाते-बजाते और संगीतका आनन्द लेते हुए यथावसर अपनी-अपनी रुचिके अनुसार विहार करने लगे ॥ ६० ॥
एवमुत्तमवीर्यास्ते विहृत्य दिवसान् बहून् । पूजिताः कुरुभिर्जग्मुः पुनर्द्वारवतीं प्रति ॥ ६१ ॥ इस प्रकार वे उत्तम पराक्रमी यदुवंशी बहुत दिनोंतक इन्द्रप्रस्थमें विहार करते हुए कौरवोंसे सम्मानित हो फिर द्वारका चले गये ॥ ६१ ॥
रामं पुरस्कृत्य ययुर्वृष्ण्यन्धकमहारथाः । रत्नान्यादाय शुभ्राणि दत्तानि कुरुसत्तमैः ॥ ६२ ॥ वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी कुरुप्रवर पाण्डवोंके दिये हुए उज्ज्वल रत्नोंकी भेंट ले बलरामजीको आगे करके चले गये ॥ ६२ ॥
वासुदेवस्तु पार्थेन तत्रैव सह भारत । उवास नगरे रम्ये शक्रप्रस्थे महात्मना ॥ ६३ ॥ जनमेजय! परंतु भगवान् वासुदेव महात्मा अर्जुनके साथ रमणीय इन्द्रप्रस्थमें ही ठहर गये ॥ ६३ ॥
व्यचरद् यमुनातीरे मृगयां स महायशाः । मृगान् विध्यन् वराहांश्च रेमे सार्धं किरीटिना ॥ ६४ ॥ महायशस्वी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ शिकार खेलते और जंगली वराहों तथा हिंस्र पशुओंका वध करते हुए यमुनाजीके तटपर विचरते थे। इस प्रकार वे किरीटधारी अर्जुनके साथ विहार करते थे ॥ ६४ ॥
ततः सुभद्रा सौभद्रं केशवस्य प्रिया स्वसा । जयन्तमिव पौलोमी ख्यातिमन्तमजीजनत् ॥ ६५ ॥