महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः । जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते ॥ २८ ॥ प्रलयकालमें आपसे ही भयंकर ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालती हैं। महान् तेजस्वी जातवेदा! आपसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है ॥ २८ ॥ तवैव कर्म विहितं भूतं सर्वं चराचरम् । त्वयाऽऽपो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् ॥ २९ ॥ तथा आपके ही द्वारा कर्मोंका विधान किया गया है और सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। आपसे ही पूर्वकालमें जलकी सृष्टि हुई है और आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २९ ॥ त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत् सम्प्रतिष्ठितम् । त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः ॥ ३० ॥ त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः । आपहीमें हव्य और कव्य यथावत् प्रतिष्ठित हैं। देव! आप ही दग्ध करनेवाले अग्नि, धारण-पोषण करनेवाले धाता और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही युगल अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चन्द्रमा और वायु हैं ॥ ३०१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः ॥ ३१ ॥ तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः । उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते ॥ ३२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित-तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले—‘मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ?’ ॥ ३१-३२ ॥ तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् । प्रदहन् खाण्डवं दावं मम पुत्रान् विसर्जैय ॥ ३३ ॥ तब मन्दपालने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निसे कहा—‘भगवन्! आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दें’ ॥ ३३ ॥ तथेति तत् प्रतिश्रुत्य भगवान् हव्यवाहनः । खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ३४ ॥ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् हव्यवाहनने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की और उस समय खाण्डववनको जलानेके लिये वे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्यानेऽष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥