भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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१६६- द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति १६७- कुन्तीकी अपने पुत्रोंसे पूछकर पांचालदेशमें जानेकी तैयारी १६८- व्यासजीका पाण्डवोंको द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना १६९- पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता १७०- सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना १७१- तपती और संवरणकी बातचीत १७२- वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति १७३- गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना १७४- वसिष्ठजीके अद्भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव १७५- शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक १७६- कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति १७७- शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना १७८- पितरोंद्वारा और्वके क्रोधका निवारण १७९- और्व और पितरोंकी बातचीत तथा और्वका अपनी क्रोधाग्निको बड़वानलरूपसे समुद्रमें त्यागना १८०- पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति १८१- राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप १८२- पाण्डवोंका धौम्यको अपना पुरोहित बनाना

(स्वयंवरपर्व)

१८३- पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत १८४- पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा १८५- धृष्टद्युम्नका द्रौपदीको स्वयंवरमें आये हुए राजाओंका परिचय देना १८६- राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना १८७- अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना १८८- द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे