महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1612, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात् तदा ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे ॥ २५-२६ ॥ मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् । अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने ॥ २७ ॥ क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रियदर्शनः । अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः ॥ २८ ॥ अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया ॥ २७-२८ ॥ निवृत्योपययुस्तूर्णं स्वं पुरं पुरुषर्षभाः । स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात् ॥ २९ ॥ अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े। उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे ॥ २९ ॥ सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा । दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः । स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मवानिव वेगवान् ॥ ३० ॥ सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था। उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण वेगशाली गरुड़की भाँति द्वारकामें पहुँच गये ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः । सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ३१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ३१ ॥ विसृज्य सुहृदः सर्वान् भ्रातृन् पुत्रांश्च धर्मराट् । मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप ॥ ३२ ॥