महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1618, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे राक्षस भयंकर आकृतिवाले, आकाशमें विचरने-वाले, विशालकाय और महाबली थे। उनकी आँखें लाल और पिंगलवर्णकी थीं तथा कान सीपीके समान जान पड़ते थे। वे सब-के-सब प्रहार करनेमें कुशल थे॥ २९॥
तस्यां सभायां नलिनीं चकाराप्रतिमां मयः।
वैदूर्यपत्रविततां मणिनालमयाम्बुजाम्॥ ३०॥
मयासुरने उस सभाभवनके भीतर एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी बना रखी थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसमें इन्द्रनीलमणिमय कमलके पत्ते फैले हुए थे। उन कमलोंके मृणाल मणियोंके बने थे॥ ३०॥
पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम्।
पुष्पितैः पङ्कजैश्चित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्च काञ्चनैः।
चित्रस्फटिकसोपानां निष्पङ्कसलिलां शुभाम्॥ ३१॥
उसमें पद्मरागमणिमय कमलोंकी मनोहर सुगंध छा रही थी। अनेक प्रकारके पक्षी उसमें रहते थे। खिले हुए कमलों और सुनहली मछलियों तथा कछुओंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उस पोखरीमें उतरनेके लिये स्फटिकमणिकी विचित्र सीढ़ियाँ बनी थीं। उसमें पंकरहित स्वच्छ जल भरा हुआ था। वह देखनेमें बड़ी सुन्दर थी॥ ३१॥
मन्दानिलसमुद्धूतां मुक्ताबिन्दुभिराचिताम्।
महामणिशिलापट्टबद्धपर्यन्तवेदिकाम्॥ ३२॥