भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1652, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1652

युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे ।। ५-६ ।।

युधिष्ठिर उवाच

भवान् संचरते लोकान् सदा नानाविधान् बहून् ।
ब्रह्मणा निर्मितान् पूर्वं प्रेक्षमाणो मनोजवः ।। ७ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**मुनिवर! आप मनके समान वेगशाली हैं, अतः ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिनका निर्माण किया है, उन अनेक प्रकारके बहुत-से लोकोंका दर्शन करते हुए आप उनमें सदा बेरोक-टोक विचरते रहते हैं ।। ७ ।।

ईदृशी भवता काचिद् दृष्टपूर्वा सभा क्वचित् ।
इतो वा श्रेयसी ब्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ।। ८ ।।
ब्रह्मन्! क्या आपने पहले कहीं ऐसी या इससे भी अच्छी कोई सभा देखी है? मैं जानना चाहता हूँ, अतः आप मुझसे यह बात बतावें ।। ८ ।।

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा नारदस्तस्य धर्मराजस्य भाषितम् ।
पाण्डवं प्रत्युवाचेदं स्मयन् मधुरया गिरा ।। ९ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर देवर्षि नारदजी मुसकराने लगे और उन पाण्डुकुमारको इसका उत्तर देते हुए मधुर वाणीमें बोले ।। ९ ।।

नारद उवाच

मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता ।
सभा मणिमयी राजन् यथेयं तव भारत ।। १० ।।
**नारदजीने कहा—**तात! भरतवंशी नरेश! मणि एवं रत्नोंकी बनी हुई जैसी तुम्हारी यह सभा है, ऐसी सभा मैंने मनुष्यलोकमें न तो पहले कभी देखी है और न कानोंसे ही सुनी है ।। १० ।।

सभां तु पितृराजस्य वरुणस्य च धीमतः ।
कथयिष्ये तथैन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च ।। ११ ।।
ब्रह्मणश्च सभां दिव्यां कथयिष्ये गतक्लमाम् ।
दिव्यादिव्यैरभिप्रायैरुपैतां विश्वरूपिणीम् ।। १२ ।।
देवैः पितृगणैः साध्यैर्यज्वभिर्नियतात्मभिः ।
जुष्टां मुनिगणैः शान्तैर्वेदैर्यज्ञैः सदक्षिणैः ।
यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ ।। १३ ।।

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 1652, कुल 2256 में से · BharatKosha