महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1806, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं क्रथम् ।। ७ ।। युध्यमानं बलात् संख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः । इसके बाद पाण्डुपुत्र भीमने सुपार्श्वके निकट राजराजेश्वर क्रथको, जो युद्धमें बलपूर्वक उनका सामना कर रहे थे, हरा दिया ।। ७ १/२ ।।
ततो मत्स्यान् महातेजा मलदांश्च महाबलान् ।। ८ ।। अनघानभयांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः । निवृत्य च महाबाहुर्मदधारं महीधरम् ।। ९ ।। सोमधेयांश्च निर्जित्य प्रयायावुत्तरामुखः । वत्सभूमिं च कौन्तेयो विजिग्ये बलवान् बलात् ।। १० ।। तत्पश्चात् महातेजस्वी कुन्तीकुमारने मत्स्य, महाबली मलद, अनघ और अभय नामक देशोंको जीतकर पशुभूमि (पशुपतिनाथके निकटवर्ती स्थान—नेपाल)-को भी सब ओरसे जीत लिया। वहाँसे लौटकर महाबाहु भीमने मदधार पर्वत और सोमधेयनिवासियों-को परास्त किया। इसके बाद बलवान् भीमने उत्तराभिमुख यात्रा की और वत्सभूमिपर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया ।। ८—१० ।।
भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा । विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान् बहून् ।। ११ ।। ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पर्वतम् । तरसैवाजयद् भीमो नातितीव्रेण कर्मणा ।। १२ ।। फिर क्रमशः भर्गोंके स्वामी, निषादोंके अधिपति तथा मणिमान् आदि बहुत-से भूपालोंको अपने अधिकारमें कर लिया। तदनन्तर दक्षिण मल्लदेश तथा भोगवान् पर्वतको भीमसेनने अधिक प्रयास किये बिना ही वेगपूर्वक जीत लिया ।। ११-१२ ।।
शर्मकान् वर्मकांश्चैव व्यजयत् सान्त्वपूर्वकम् । वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् ।। १३ ।। विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा । शकांश्च बर्बरांश्चैव अजयच्छद्मपूर्वकम् ।। १४ ।। शर्मक और वर्मकोंको उन्होंने समझा-बुझाकर ही जीत लिया। विदेह देशके राजा जनकको भी पुरुषसिंह भीमने अधिक उग्र प्रयास किये बिना ही परास्त किया। फिर शकों और बर्बरोंपर छलसे विजय प्राप्त कर ली ।। १३-१४ ।।
वैदेहस्थस्तु कौन्तेय इन्द्रपर्वतमन्तिकात् । किरातानामधिपतीनजयत् सप्त पाण्डवः ।। १५ ।। ततः सुह्यान् प्रसुह्यांश्च सपक्षानतिवीर्यवान् । विजित्य युधि कौन्तेयो मागधानभ्यधाद् बली ।। १६ ।।