भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1856

विचिक्षिपुर्यथा श्येना नभोगतमिवामिषम् ॥ ६ ॥ वहीं कुछ मेधावी पण्डित, जो दूसरोंके कथनमें दोष दिखानेके ही अभ्यासी थे, अन्य लोगोंके कहे हुए अनुमानसाधित विषयको उसी तरह बीचसे ही लोक लेते थे, जैसे बाज मांसके लोथड़ेको आकाशमें ही एक-दूसरेसे छीन लेते हैं ॥ ६ ॥ केचिद् धर्मार्थकुशलाः केचित् तत्र महाव्रताः । रेमिरे कथयन्तश्च सर्वभाष्यविदां वराः ॥ ७ ॥ उन्हींमें कुछ लोग धर्म और अर्थके निर्णयमें अत्यन्त निपुण थे। कोई महान् व्रतका पालन करनेवाले थे। इस प्रकार सम्पूर्ण भाष्यके विद्वानोंमें श्रेष्ठ वे महात्मा अच्छी कथाएँ और शिक्षाप्रद बातें कहकर स्वयं भी सुखी होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते थे ॥ ७ ॥ सा वेदिर्वेदसम्पन्नैर्देवद्विजमहर्षिभिः । आबभासे समाकीर्णा नक्षत्रैरद्यौरिवायता ॥ ८ ॥ जैसे नक्षत्रमालाओंद्वारा मण्डित विशाल आकाश मण्डलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वेदज्ञ देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों और महर्षियोंसे वह वेदी सुशोभित हो रही थी ॥ ८ ॥ न तस्यां संनिधौ शूद्रः कश्चिदासीन्न चाव्रती । अन्तर्वेद्यां तदा राजन् युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ९ ॥ राजन् युधिष्ठिरकी यज्ञशालाके भीतर उस अन्तर्वेदीके आस-पास उस समय न तो कोई शूद्र था और न व्रतहीन द्विज ही ॥ ९ ॥ तां तु लक्ष्मीवतो लक्ष्मीं तदा यज्ञविधानजाम् । तुतोष नारदः पश्यन् धर्मराजस्य धीमतः ॥ १० ॥ परम बुद्धिमान् राजलक्ष्मीसम्पन्न धर्मराज युधिष्ठिरके उस धन-वैभव और यज्ञविधिको देखकर देवर्षि नारदको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १० ॥ अथ चिन्तां समापेदे स मुनिर्मनुजाधिप । नारदस्तु तदा पश्यन् सर्वक्षत्रसमागमम् ॥ ११ ॥ जनमेजय! उस समय वहाँ समस्त क्षत्रियोंका सम्मेलन देखकर मुनिवर नारदजी सहसा चिन्तित हो उठे ॥ ११ ॥ सस्मार च पुरा वृत्तां कथां तां पुरुषर्षभ । अंशावतरणे यासौ ब्रह्मणो भवनेऽभवत् ॥ १२ ॥ नरश्रेष्ठ! भगवान्‌के सम्पूर्ण अंशों (देवताओं)-सहित अवतार लेनेके सम्बन्धमें ब्रह्मलोकमें पहले जो चर्चा हुई थी, वह प्राचीन घटना उन्हें याद आ गयी ॥ १२ ॥ देवानां संगमं तं तु विज्ञाय कुरुनन्दन । नारदः पुण्डरीकाक्षं सस्मार मनसा हरिम् ॥ १३ ॥ कुरुनन्दन! नारदजीने यह जानकर कि राजाओंके इस समुदायके रूपमें वास्तवमें देवताओंका ही समागम हुआ है, मन-ही-मन कमलनयन भगवान् श्रीहरिका चिन्तन