महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधृतराष्ट्र दुर्योधनके पास जाकर बोले—बेटा दुर्योधन! तुम्हारे दुःखका कारण क्या है? सुना है, तुम बड़े कष्टमें हो। कुरुनन्दन! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो वह बात मुझे बताओ॥ ६॥
अयं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिणं कृशम्।
चिन्तयंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम्॥ ७॥
यह शकुनि कहता है कि तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। तुम सफेद और दुबले हो गये हो; परंतु मैं बहुत सोचनेपर भी तुम्हारे शोकका कोई कारण नहीं देखता॥
ऐश्वर्यं हि महत् पुत्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भ्रातरः सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रियम्॥ ८॥
बेटा! इस सम्पूर्ण महान् ऐश्वर्यका भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे भाई और सुहृद् कभी तुम्हारे प्रतिकूल आचरण नहीं करते॥ ८॥
आच्छादयसि प्रावारानश्नासि विशदौदनम्।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः॥ ९॥
तुम बहुमूल्य वस्त्र ओढ़ते-पहनते हो, बढ़िया विशुद्ध भात खाते हो तथा अच्छी जातिके घोड़े तुम्हारी सवारीमें रहते हैं; फिर किस दुःखसे तुम सफेद और दुबले हो गये हो?॥ ९॥
शयनानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः।
गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम्॥ १०॥
देवानाभिव ते सर्वं वाचि बद्धं न संशयः।
स दीन इव दुर्धर्ष कस्माच्छोचसि पुत्रक॥ ११॥
बहुमूल्य शय्याएँ, मनको प्रिय लगनेवाली युवतियाँ, सभी ऋतुओंमें लाभदायक भवन और इच्छानुसार सुख देनेवाले विहारस्थान—देवताओंकी भाँति ये सभी वस्तुएँ निःसंदेह तुम्हें वाणीद्वारा कहनेमात्रसे सुलभ हैं। मेरे दुर्धर्ष पुत्र! फिर तुम दीनकी भाँति क्यों शोक करते हो?॥ १०-११॥
(उपस्थितः सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा।
विविधैरन्नपानैश्च प्रवरैः किं नु शोचसि॥
जैसे स्वर्गमें इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवांछित भोग सुलभ हैं, उसी प्रकार समस्त अभिलषित भोग और खाने-पीनेकी विविध उत्तम वस्तुएँ तुम्हारे लिये सदा प्रस्तुत हैं। फिर तुम किसलिये शोक करते हो?
निरुक्तं निगमं छन्दः सषडङ्गार्थशास्त्रवान्।
अधीतः कृतविद्यस्त्वमष्टव्याकरणैः कृपात्॥
तुमने कृपाचार्यसे निरुक्त, निगम, छन्द, वेदके छहों अंग, अर्थशास्त्र तथा आठ प्रकारके व्याकरणशास्त्रोंका अध्ययन किया है।