भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रायाद् विदुरोऽश्वैरुदारै-<br> र्महाजवैर्बलिभिः साधुदान्तैः।<br> बलान्नियुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा<br> मनीषिणां पाण्डवानां सकाशे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा धृतराष्ट्रके बलपूर्वक भेजनेपर विदुरजी अत्यन्त वेगशाली, बलवान् और अच्छी प्रकार काबूमें किये हुए महान् अश्वोंसे जुते रथपर सवार हो परम बुद्धिमान् पाण्डवोंके समीप गये ॥ १ ॥

सोऽभिपत्य तदध्वानमासाद्य नृपतेः पुरम्।<br> प्रविवेश महाबुद्धिः पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २ ॥

महाबुद्धिमान् विदुरजी उस मार्गको तय करके राजा युधिष्ठिरकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ द्विजातियोंसे सम्मानित होकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥

स राजगृहमासाद्य कुबेरभवनोपमम्।<br> अभ्यागच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥<br> तं वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा<br> अजातशत्रुर्विदुरं यथावत्।<br> पूजापूर्वं प्रतिगृह्याजमीढ-<br> स्ततोऽपृच्छद् धृतराष्ट्रं सपुत्रम् ॥ ४ ॥

कुबेरके भवनके समान सुशोभित राजमहलमें जाकर धर्मात्मा विदुर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे मिले। सत्यवादी महात्मा अजमीढनन्दन अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने विदुरजीका यथावत् आदर-सत्कार करके उनसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रकी कुशल पूछी ॥ ३-४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

विज्ञायते ते मनसोऽप्रहर्षः<br> कच्चित् क्षत्तः कुशलेनागतोऽसि।<br> कच्चित् पुत्राः स्थविरस्यानुलोमा<br> वशानुगाश्चापि विशोऽथ कच्चित् ॥ ५ ॥

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