भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2129, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2129

अर्जुन यद्यपि दाँवपर लगानेयोग्य नहीं हैं, तो भी उनको दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ

खेलता हूँ ।। २१ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।

जितमित्येव शकुनिर्य्युधिष्ठिरमभाषत ।। २२ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने पूर्ववत् विजयका

निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा—'यह भी मैंने ही जीता' ।। २२ ।।

शकुनिरुवाच

अयं मया पाण्डवानां धनुर्धरः

पराजितः पाण्डवः सव्यसाची ।

भीमेन राजन् दयितेन दीव्य

यत् कैतवं पाण्डव तेऽवशिष्टम् ।। २३ ।।

शकुनि फिर बोला—राजन्! ये पाण्डवोंमें धनुर्धर वीर सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा

जीत लिये गये। पाण्डुनन्दन! अब आपके पास भीमसेन ही जुआरियोंको प्राप्त होनेवाले

धनके रूपमें शेष हैं, अतः उन्हींको दाँवपर रखकर खेलिये ।। २३ ।।

युधिष्ठिर उवाच

यो नो नेता युधि नः प्रणेता

यथा वज्री दानवशत्रुरेकः ।

तिर्यक्प्रेक्षी संनतभूर्महात्मा

सिंहस्कन्धो यश्च सदात्यमर्षी ।। २४ ।।

बलेन तुल्यो यस्य पुमान् न विद्यते

गदाभृतामग्रय इहारिमर्दनः ।

अनर्हता राजपुत्रेण तेन

दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन् ।। २५ ।।

युधिष्ठिरने कहा—राजन्! जो युद्धमें हमारे सेनापति और दानवशत्रु वज्रधारी इन्द्रके

समान अकेले ही आगे बढ़नेवाले हैं; जो तिरछी दृष्टिसे देखते हैं, जिनकी भौंहें धनुषकी

भाँति झुकी हुई हैं, जिनका हृदय विशाल और कंधे सिंहके समान हैं, जो सदा अत्यन्त

अमर्षमें भरे रहते हैं, बलमें जिनकी समानता करनेवाला कोई पुरुष नहीं है, जो

गदाधारियोंमें अग्रगण्य तथा अपने शत्रुओंको कुचल डालनेवाले हैं, उन्हीं राजकुमार

भीमसेनको दाँवपर लगाकर मैं जूआ खेलता हूँ। यद्यपि वे इसके योग्य नहीं हैं ।। २४-२५ ।।

वैशम्पायन उवाच

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 2129, कुल 2256 में से · BharatKosha