महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिरं ते प्रवदन्त्वनीश- मथो दास्यान्मोक्ष्यसे याज्ञसेनि ॥ २० ॥ **दुर्योधन बोला—**द्रौपदी! मैं भीम, अर्जुन एवं नकुल-सहदेवकी बात माननेके लिये तैयार हूँ। ये सब लोग कह दें कि युधिष्ठिरको तुम्हें हारनेका कोई अधिकार नहीं था, फिर तुम दासीपनसे मुक्त कर दी जाओगी ॥ २० ॥
अर्जुन उवाच
ईशो राजा पूर्वमासीद् ग्लहे नः कुन्तीसुतो धर्मराजो महात्मा । ईशस्त्वयं कस्य पराजितात्मा तज्जानीध्वं कुरवः सर्व एव ॥ २१ ॥ **अर्जुनने कहा—**कुन्तीनन्दन महात्मा धर्मराज राजा युधिष्ठिर पहले तो हमें दाँवपर लगानेके अधिकारी थे ही, किंतु जब वे अपने शरीरको ही हार गये, तब किसके स्वामी रहे? इस बातपर सब कौरव विचार करें ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो राज्ञो धृतराष्ट्रस्य गेहे गोमायुरुच्चैर्व्याहरदग्निहोत्रे । तं रासभाः प्रत्यभाषन्त राजन् समन्ततः पक्षिणश्चैव रौद्राः ॥ २२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्रकी अग्निशालाके भीतर एक गीदड़ आकर जोर-जोरसे हुँआ-हुँआ करने लगा। उस शब्दको लक्ष्य करके सब ओर गदहे रेंकने लगे तथा गृध्र आदि भयंकर पक्षी भी चारों ओर अशुभसूचक कोलाहल करने लगे ॥ २२ ॥