भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2187, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2187

अपने छोटे भाइयोंके साथ खड़े हुए भीमसेन उपर्युक्त बात कहकर शत्रुओंकी ओर बार-बार देखने लगे; मानो सिंह मृगोंके समूहमें खड़ा हो उन्हींकी ओर देख रहा हो ।। सान्त्व्यमानो वीक्षमाणः पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । खिद्यत्येव महाबाहुरन्तर्दाहेन वीर्यवान् ।। १३ ।। अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले अर्जुन शत्रुओंकी ओर देखनेवाले भीमसेनको बार-बार शान्त कर रहे थे, परंतु पराक्रमी महाबाहु भीमसेन अपने भीतर धधकती हुई क्रोधाग्निसे जल रहे थे ।। १३ ।। क्रुद्धस्य तस्य स्रोतोभ्यः कर्णादिभ्यो नराधिप । सधूमः सस्फुलिङ्गार्चिः पावकः समजायत ।। १४ ।। राजन्! उस समय क्रोधमें भरे हुए भीमसेनकी श्रवणादि इन्द्रियोंके छिद्रों तथा रोमकूपोंसे धूम और चिनगारियोंसहित आगकी लपटें निकल रहीं थीं ।। १४ ।। भ्रुकुटीकृतदुष्प्रेक्ष्यमभवत् तस्य तन्मुखम् । युगान्तकाले सम्प्राप्ते कृतान्तस्येव रूपिणः ।। १५ ।। भौंहें तनी होनेके कारण प्रलयकालमें मूर्तिमान् यमराजकी भाँति उनके भयानक मुखकी ओर देखना भी कठिन हो रहा था ।। १५ ।। युधिष्ठिरस्तमावार्य बाहुना बाहुशालिनम् । मैवमित्यब्रवीच्चैनं जोषमास्स्वेति भारत ।। १६ ।। भारत! तब विशाल भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले भीमसेनको अपने एक हाथसे रोकते हुए युधिष्ठिरने कहा—'ऐसा न करो, शान्तिपूर्वक बैठ जाओ' ।। १६ ।। निवार्य च महाबाहुं कोपसंरक्तलोचनम् । पितरं समुपातिष्ठद् धृतराष्ट्रं कृताञ्जलिः ।। १७ ।। उस समय महाबाहु भीमके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उन्हें रोककर राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़े हुए अपने ताऊ महाराज धृतराष्ट्रके पास गये ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीमक्रोधे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें भीमसेनका क्रोधविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७२ ।।