भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2215

पुरुषको, जिसे चाहो, अपना पति बना लो ।। ११ ।। एते हि सर्वे कुरवः समेताः क्षान्ता दान्ताः सुद्रविणोपपन्नाः । एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे न त्वां तपेत् कालविपर्ययोऽयम् ।। १२ ।। ‘ये समस्त कौरव क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा उत्तम धन-वैभवसे सम्पन्न हैं। इन्हींमेंसे किसीको अपना पति चुन लो, जिससे यह विपरीत काल (निर्धनावस्था) तुम्हें संतप्त न करे ।। १२ ।।

यथाफलाः षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगाः । तथैव पाण्डवाः सर्वे यथा काकयवा अपि ।। १३ ।। ‘जैसे थोथे तिल बोनेपर फल नहीं देते हैं, जैसे केवल चर्ममय मृग व्यर्थ हैं तथा जैसे काकयव (तंदुलरहित तृणधान्य) निष्प्रयोजन होते हैं, उसी प्रकार समस्त पाण्डवोंका जीवन निरर्थक हो गया है ।। १३ ।।

किं पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य मोघः श्रमः षण्ढतिलानुपास्य । एवं नृशंसः परुषाणि पार्था- नश्रावयद् धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ।। १४ ।। ‘थोथे तिलोंकी भाँति इन पतित और नपुंसक पाण्डवोंकी सेवा करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा, व्यर्थका परिश्रम ही तो उठाना पड़ेगा।’ इस प्रकार धृतराष्ट्रके नृशंस पुत्र दुःशासनने पाण्डवोंको बहुत-से कठोर वचन सुनाये ।। १४ ।।

तद् वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी निर्भर्त्स्योच्चैः संनिगृह्यैव रोषात् । उवाच चैनं सहसैवोपगम्य सिंहो यथा हैमवतः शृगालम् ।। १५ ।। यह सब सुनकर भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। जैसे हिमालयकी गुफामें रहनेवाला सिंह गीदड़के पास जाय, उसी प्रकार वे सहसा दुःशासनके पास जा पहुँचे और रोषपूर्वक उसे रोककर जोर-जोरसे फटकारते हुए बोले ।। १५ ।।

भीमसेन उवाच

क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे । गान्धारविद्याया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे ।। १६ ।।