भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2228

परैः परीतान् संहृष्टैः सुहृद्भिश्चानुशोचितान् ।। ११ ।। उनके सभी अंग मृगचर्मसे ढँके हुए थे और वे लज्जावश नीचे मुख किये चले जा रहे थे। हर्षमें भरे हुए शत्रुओंने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था और हितैषी सुहृद् उनके लिये शोक कर रहे थे ।। ११ ।।

तदवस्थान् सुतान् सर्वानुपसृत्यातिवत्सला । स्वजमानावदच्छोकात् तत्तद् विलपती बहु ।। १२ ।। उस अवस्थामें उन सभी पुत्रोंके निकट पहुँचकर कुन्तीके हृदयमें अत्यन्त वात्सल्य उमड़ आया। वे उन्हें हृदयसे लगाकर शोकवश बहुत विलाप करती हुई बोलीं ।। १२ ।।

कुन्त्युवाच

कथं सद्धर्मचारित्रान् वृत्तस्थितिविभूषितान् । अक्षुद्रान् दृढभक्तांश्च दैवतेज्यापरान् सदा ।। १३ ।। व्यसनं वः समभ्यागात् कोऽयं विधिविपर्ययः । कस्यापध्यानजं चेदं धिया पश्यामि नैव तत् ।। १४ ।। कुन्तीने कहा— पुत्रो! तुम उत्तम धर्मका पालन करनेवाले तथा सदाचारकी मर्यादासे विभूषित हो। तुममें क्षुद्रताका अभाव है। तुम भगवान्‌के सुदृढ़ भक्त और देवाराधनमें सदा तत्पर रहनेवाले हो, तो भी तुम्हारे ऊपर यह विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है। विधाताका यह कैसा विपरीत विधान है। किसके अनिष्टचिन्तनसे तुम्हारे ऊपर यह महान् दुःख आया है, यह बुद्धिसे बार-बार विचार करनेपर भी मुझे कुछ सूझ नहीं पड़ता ।। १३-१४ ।।

स्यात् तु मद्भाग्यदोषोऽयं याहं युष्मानजीजनम् । दुःखायासभुजोऽत्यर्थं युक्तानप्युत्तमैर्गुणैः ।। १५ ।। यह मेरे ही भाग्यका दोष हो सकता है। तुम तो उत्तम गुणोंसे युक्त हो तो भी अत्यन्त दुःख और कष्ट भोगनेके लिये ही मैंने तुम्हें जन्म दिया है ।। १५ ।।

कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वने ऋद्धिविनाकृताः । वीर्यसत्त्वबलोत्साहतेजोभिरकृशाः कृशाः ।। १६ ।। इस प्रकार सम्पत्तिसे वंचित होकर तुम वनके दुर्गम स्थानोंमें कैसे रह सकोगे? वीर्य, धैर्य, बल, उत्साह और तेजसे परिपुष्ट होते हुए भी तुम दुर्बल हो ।। १६ ।।

यद्येतदेवमज्ञास्यं वने वासो हि वो ध्रुवम् । शतशृङ्गान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्वयम् ।। १७ ।। यदि मैं यह जानती कि नगरमें आनेपर तुम्हें निश्चय ही वनवासका कष्ट भोगना पड़ेगा तो महाराज पाण्डुके परलोकवासी हो जानेपर शतशृंगपुरसे हस्तिनापुर नहीं आती ।। १७ ।।

धन्यं वः पितरं मन्ये तपोमेधान्वितं तथा ।