भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2232

दशामें देखकर लोगोंके हृदयमें गहरी चोट पहुँची और वे सब लोग नाना प्रकारकी बातें करने लगे।

जना ऊचुः

यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत् । तमेवं कृष्णया सार्धमनुयान्ति स्म पाण्डवाः ॥ चत्वारो भ्रातरश्चैव पुरोधाश्च विशाम्पतिम् । नगरनिवासी मनुष्य बोले—अहो! यात्रा करते समय जिनके पीछे विशाल चतुरंगिणी सेना चलती थी, आज वे ही राजा युधिष्ठिर इस प्रकार जा रहे हैं और उनके पीछे द्रौपदीके साथ केवल चार भाई पाण्डव तथा पुरोहित चल रहे हैं।

या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि ।। तामद्य कृष्णां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः । जिसे आजसे पहले आकाशचारी प्राणीतक नहीं देख पाते थे, उसी द्रुपदकुमारी कृष्णाको अब सड़कपर चलनेवाले साधारण लोग भी देख रहे हैं।

अङ्गरागोचितां कृष्णां रक्तचन्दनसेविनीम् ।। वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् । सुकुमारी द्रौपदीके अंगोंमें दिव्य अंगराग शोभा पाता था। वह लाल चन्दनका सेवन करती थी, परंतु अब वनमें सर्दी, गर्मी और वर्षा लगनेसे उसकी अंगकान्ति शीघ्र ही फीकी पड़ जायगी।

अद्य नूनं पृथा देवी सत्त्वमाविश्य भाषते ।। पुत्रान् स्नुषां च देवी तु द्रष्टुमद्याथ नार्हति ।। निश्चय ही आज कुन्तीदेवी बड़े भारी धैर्यका आश्रय लेकर अपने पुत्रों और पुत्रवधूसे वार्तालाप करती हैं; अन्यथा इस दशामें वे इनकी ओर देख भी नहीं सकतीं।

निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् दुःखदर्शनम् । किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम् ।। गुणहीन पुत्रका भी दुःख मातासे कैसे देखा जायगा; फिर जिस पुत्रके सदाचारमात्रसे यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसपर कोई दुःख आये तो उसकी माता वह कैसे देख सकती है?

आनृशंस्यमनुक्रोशो धृतिः शीलं दमः शमः । पाण्डवं शोभयन्त्येते षड् गुणाः पुरुषोत्तमम् ।। तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः । पुरुषरत्न पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको कोमलता, दया, धैर्य, शील, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह—ये छः सद्गुण सुशोभित करते हैं। अतः उनकी हानिसे आज सारी प्रजाको