भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2233

बड़ी पीड़ा हो रही है। औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ।। पीडया पीडितं सर्वं जगत् तस्य जगत्पतेः । मूलस्यैवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः ।। जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी घट जानेसे जलचर जीव-जन्तु व्यथित हो उठते हैं एवं जड़ कट जानेसे फल और फूलोंसे युक्त वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्के पालक महाराज युधिष्ठिरकी पीड़ासे सारा संसार पीड़ित हो गया है। मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युतिः । पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जनाः ।। ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्राः सहबान्धवाः । गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डवः ।। महातेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिर मनुष्योंके मूल हैं। जगत्के दूसरे लोग उन्हींकी शाखा, पत्र, पुष्प और फल हैं। आज हम अपने पुत्रों और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर चारों भाई पाण्डवोंकी भाँति शीघ्र उसी मार्गसे उनके पीछे-पीछे चलें, जिससे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर जा रहे हैं। उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च । एकदुःखसुखाः पार्थमनुयाम सुधार्मिकम् ।। आज हम अपने खेत, बाग-बगीचे और घर-द्वार छोड़कर परम धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके साथ चल दें और उन्हींके सुख-दुःखको अपना सुख-दुःख समझें। समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च । उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः ।। रजसाप्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः । मूषकैः परिधावद्भिरुद्बिलैरावृतानि च ।। अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च । प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ।। दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च । अस्मत्त्यक्तानि वेश्मानि सौबलः प्रतिपद्यताम् ।। हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकाल लें। आँगनकी फर्श खोद डालें। सारा धन धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाडू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये