भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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सारे घर ढह जायँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें—ऐसी दशामें इन घरोंपर कपटी सुबलपुत्र शकुनि आकर अधिकार कर ले। वनं नगरमद्यास्तु यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः। अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम्॥ अब जहाँ पाण्डव जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर ही वनके रूपमें परिणत हो जाय। बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे वनानि मृगपक्षिणः। त्यजन्त्वस्मद्भयाद् भीता गजाः सिंहा वनान्यपि॥ वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ, मृग और पक्षी जंगलोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी वहाँसे दूर चले जायँ। अनाक्रान्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च। तृणमाषफलादानां देशांस्त्यक्त्वा मृगद्विजाः॥ वयं पार्थैर्वने सम्यक् सह वत्स्याम निर्वृताः। हमलोग तृण (साग-पात), अन्न और फलका उपयोग करनेवाले हैं। जंगलके हिंसक पशु और पक्षी हमारे रहनेके स्थानोंको छोड़कर चले जायँ। वे ऐसे स्थानका आश्रय लें, जहाँ हम न जायँ और वे उन स्थानोंको छोड़ दें, जिनका हम सेवन करें। हमलोग वनमें कुन्तीपुत्रोंके साथ बड़े सुखसे रहेंगे।

वैशम्पायन उवाच

इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः। शुश्राव पार्थः श्रुत्वा च न विचक्रेऽस्य मानसम्॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार भिन्न-भिन्न मनुष्योंकी कही हुई भाँति-भाँतिकी बातें युधिष्ठिरने सुनीं। सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं आया। ततः प्रासादसंस्थास्तु समन्ताद् वै गृहे गृहे। ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषितः॥ ततः प्रासादजालानामुत्पाट्यावरणानि च। ददृशुः पाण्डवान् दीनान् रौरवाजिनवाससः॥ कृष्णां त्वदृष्टपूर्वां तां व्रजन्तीं पद्भिरेव च। एकवस्त्रां रुदन्तीं तां मुक्तकेशीं रजस्वलाम्॥ दृष्ट्वा तदा स्त्रियः सर्वा विवर्णवदना भृशम्। विलप्य बहुधा मोहाद् दुःखशोकेन पीडिताः॥ हा हा धिग् धिग् धिगित्युक्त्वा नेत्रैरश्रूण्यवर्तयन्।)