महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निराशिरिवोद्भासन् समिद्धोऽतिभयंकरः । विद्युद्विस्पष्टपिङ्गाक्षो युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ ७ ॥ वे प्रज्वलित अग्नि-पुंजके समान उद्भासित होकर अत्यन्त भयंकर जान पड़ते थे। उनकी आँखें बिजलीके समान चमकनेवाली और पिंगलवर्णकी थीं। वे प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित एवं प्रकाशित हो रहे थे ॥ ७ ॥
प्रवृद्धः सहसा पक्षी महाकायो नभोगतः । घोरो घोरस्वनो रौद्रो वह्निरीव इवापरः ॥ ८ ॥ उनका शरीर थोड़ी ही देरमें बढ़कर विशाल हो गया। पक्षी गरुड आकाशमें उड़ चले। वे स्वयं तो भयंकर थे ही, उनकी आवाज भी बड़ी भयानक थी। वे दूसरे बड़वानलकी भाँति बड़े भीषण जान पड़ते थे ॥ ८ ॥
तं दृष्ट्वा शरणं जग्मुर्देवाः सर्वे विभावसुम् । प्रणिपत्याब्रुवंश्चैनमासीनं विश्वरूपिणम् ॥ ९ ॥ उन्हें देखकर सब देवता विश्वरूपधारी अग्निदेवकी शरणमें गये और उन्हें प्रणाम करके बैठे हुए उन अग्निदेवसे इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
अग्ने मा त्वं प्रवर्धिष्ठाः कच्चिन्नो न दिधक्षसि । असौ हि राशिः सुमहान् समिद्धस्तव सर्पति ॥ १० ॥ 'अग्ने! आप इस प्रकार न बढ़ें। आप हमलोगोंको जलाकर भस्म तो नहीं कर डालना चाहते हैं? देखिये, वह आपका महान् प्रज्वलित तेजःपुंज इधर ही फैलता आ रहा है' ॥ १० ॥
अग्निरुवाच
नैतदेवं यथा यूयं मन्यध्वमसुरार्दनाः । गरुडो बलवानेष मम तुल्यश्च तेजसा ॥ ११ ॥ **अग्निदेवने कहा—**असुरविनाशक देवताओ! तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी बात नहीं है। ये महाबली गरुड हैं, जो तेजमें मेरे ही तुल्य हैं ॥ ११ ॥
जातः परमतेजस्वी विनतानन्दवर्धनः । तेजोराशिमिमं दृष्ट्वा युष्मान् मोहः समाविशत् ॥ १२ ॥ विनताका आनन्द बढ़ानेवाले ये परम तेजस्वी गरुड इसी रूपमें उत्पन्न हुए हैं। तेजके पुंजरूप इन गरुडको देखकर ही तुमलोगोंपर मोह छा गया है ॥ १२ ॥
नागक्षयकरश्चैव काश्यपेयो महाबलः । देवानां च हिते युक्तस्त्वहितो दैत्यरक्षसाम् ॥ १३ ॥ कश्यपनन्दन महाबली गरुड नागोंके विनाशक, देवताओंके हितैषी और दैत्यों तथा राक्षसोंके शत्रु हैं ॥ १३ ॥