महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहवाके झोंकेसे दूसरे-दूसरे वृक्षोंके भी फूल झड़ रहे थे, मानो वहाँके वृक्षसमूह वहाँ उपस्थित हुए नागोंपर फूलोंकी वर्षा करते हुए उनके लिये अर्घ्य दे रहे हों ।। ७ ।। मनःसंहर्षजं दिव्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् । मत्तभ्रमरसंघुष्टं मनोज्ञाकृतिदर्शनम् ।। ८ ।। वह दिव्य वन हृदयके हर्षको बढ़ानेवाला था। गन्धर्व और अप्सराएँ उसे अधिक पसंद करती थीं। मतवाले भ्रमर वहाँ सब ओर गूँज रहे थे। अपनी मनोहर छटाके द्वारा वह अत्यन्त दर्शनीय जान पड़ता था ।। ८ ।। रमणीयं शिवं पुण्यं सर्वैर्जनमनोहरैः । नानापक्षिरुतं रम्यं कद्रुपुत्रप्रहर्षणम् ।। ९ ।। वह वन रमणीय, मंगलकारी और पवित्र होनेके साथ ही लोगोंके मनको मोहनेवाले सभी उत्तम गुणोंसे युक्त था। भाँति भाँतिके पक्षियोंके कलरवोंसे व्याप्त एवं परम सुन्दर होनेके कारण वह कद्रूके पुत्रोंका आनन्द बढ़ा रहा था ।। ९ ।। तत् ते वनं समासाद्य विजहुः पन्नगास्तदा । अब्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगेश्वरम् ।। १० ।। उस वनमें पहुँचकर वे सर्प उस समय सब ओर विहार करने लगे और महापराक्रमी पक्षिराज गरुडसे इस प्रकार बोले— ।। १० ।। वहास्मानपरं द्वीपं सुरम्यं विमलोदकम् । त्वं हि देशान् बहून् रम्यान् व्रजन् पश्यसि खेचर ।। ११ ।। 'खेचर! तुम आकाशमें उड़ते समय बहुत-से रमणीय प्रदेश देखा करते हो; अतः हमें निर्मल जलवाले किसी दूसरे रमणीय द्वीपमें ले चलो' ।। ११ ।। स विचिन्त्याब्रवीत् पक्षी मातरं विनतां तदा । किं कारणं मया मातः कर्तव्यं सर्पभाषितम् ।। १२ ।। गरुडने कुछ सोचकर अपनी माता विनतासे पूछा—'माँ! क्या कारण है कि मुझे सर्पोंकी आज्ञाका पालन करना पड़ता है?' ।। १२ ।।
विनतोवाच
दासीभूतास्मि दुर्भोगात् सपत्न्याः पतगोत्तम । पणं वितथमास्थाय सर्पैरुपधिना कृतम् ।। १३ ।। विनता बोली— बेटा पक्षिराज! मैं दुर्भाग्यवश सौतकी दासी हूँ, इन सर्पोंने छल करके मेरी जीती हुई बाजीको पलट दिया था ।। १३ ।। तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचरः । उवाच वचनं सर्पांस्तेन दुःखेन दुःखितः ।। १४ ।।