महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशोऽध्यायः
गरुडका देवताओंके साथ युद्ध और देवताओंकी पराजय
सौतिरुवाच
ततस्तस्मिन् द्विजश्रेष्ठ समुदीर्णे तथाविधे ।
गरुडः पक्षिराट् तूर्णं सम्प्राप्तो विबुधान् प्रति ॥ १ ॥
तं दृष्ट्वातिबलं चैव प्राकम्पन्त सुरास्ततः ।
परस्परं च प्रत्यघ्नन् सर्वप्रहरणान्युत ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— द्विजश्रेष्ठ! देवताओंका समुदाय जब इस प्रकार भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये उद्यत हो गया, उसी समय पक्षिराज गरुड तुरंत ही देवताओंके पास जा पहुँचे। उन अत्यन्त बलवान् गरुडको देखकर सम्पूर्ण देवता काँप उठे। उनके सभी आयुध आपसमें ही आघात-प्रत्याघात करने लगे ॥ १-२ ॥
तत्र चासीदमेयात्मा विद्युदग्निसमप्रभः ।
भौमनः सुमहावीर्यः सोमस्य परिरक्षिता ॥ ३ ॥
वहाँ विद्युत् एवं अग्निके समान तेजस्वी और महापराक्रमी अमेयात्मा भौमन (विश्वकर्मा) अमृतकी रक्षा कर रहे थे ॥ ३ ॥
स तेन पतगेन्द्रेण पक्षतुण्डनखक्षतः ।
मुहूर्तमतुलं युद्धं कृत्वा विनिहतो युधि ॥ ४ ॥
वे पक्षिराजके साथ दो घड़ीतक अनुपम युद्ध करके उनके पंख, चोंच और नखोंसे घायल हो उस रणांगणमें मृतकतुल्य हो गये ॥ ४ ॥
रजश्चोद्धूय सुमहत् पक्षवातेन खेचरः ।
कृत्वा लोकान् निरालोकांस्तेन देवानवाकिरत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर पक्षिराजने अपने पंखोंकी प्रचण्ड वायुसे बहुत धूल उड़ाकर समस्त लोकोंमें अन्धकार फैला दिया और उसी धूलसे देवताओंको ढक दिया ॥ ५ ॥
तेनावकीर्णा रजसा देवा मोहमुपागमन् ।
न चैवं ददृशुश्छन्ना रजसामृतरक्षिणः ॥ ६ ॥
उस धूलसे आच्छादित होकर देवता मोहित हो गये। अमृतकी रक्षा करनेवाले देवता भी इसी प्रकार धूलसे ढक जानेके कारण कुछ देख नहीं पाते थे ॥ ६ ॥
एवं संलोडयामास गरुडस्त्रिदिवालयम् ।
पक्षतुण्डप्रहारैस्तु देवान् स विददार ह ॥ ७ ॥
इस तरह गरुडने स्वर्गलोकको व्याकुल कर दिया और पंखों तथा चोंचोंकी मारसे देवताओंका अंग-अंग विदीर्ण कर डाला ॥ ७ ॥