महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम् । क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ॥ ३७ ॥ मार्गमें नागराज तक्षकने काश्यपको देखा। वे एकचित्त होकर हस्तिनापुरकी ओर बढ़े जा रहे थे। तब नागराजने बूढ़े ब्राह्मणका वेश बनाकर मुनिवर काश्यपसे पूछा—‘आप कहाँ बड़ी उतावलीके साथ जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?’ ॥ ३६-३७ ॥
काश्यप उवाच
नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परिक्षितमरिन्दमम् । तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति ॥ ३८ ॥ काश्यपने कहा—कुरुकुलमें उत्पन्न शत्रुदमन महाराज परीक्षित्को आज नागराज तक्षक अपनी विषाग्निसे दग्ध कर देगा ॥ ३८ ॥ तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसा । पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम् । गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम् ॥ ३९ ॥ वे राजा पाण्डवोंकी वंशपरम्पराको सुरक्षित रखने-वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी हैं। अतः सौम्य! अग्निके समान तेजस्वी नागराजके डँस लेनेपर उन्हें तत्काल विषरहित करके जीवित कर देनेके लिये मैं जल्दी-जल्दी जा रहा हूँ ॥ ३९ ॥
तक्षक उवाच
अहं स तक्षको ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् । निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ॥ ४० ॥ तक्षक बोला—ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षक हूँ। आज राजाको भस्म कर डालूँगा। आप लौट जाइये। मैं जिसे डँस लूँ, उसकी चिकित्सा आप नहीं कर सकते ॥ ४० ॥
काश्यप उवाच
अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दष्टमपज्वरम् । करिष्यामीति मे बुद्धिविद्याबलसमन्विता ॥ ४१ ॥ काश्यपने कहा—मैं तुम्हारे डँसे हुए राजाको वहाँ जाकर विषसे रहित कर दूँगा। यह विद्याबलसे सम्पन्न मेरी बुद्धिका निश्चय है ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि काश्यपागमने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें काश्यपागमनविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥