भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 462

क्रूरा (क्रोधा)-के क्रूर स्वभाववाले असंख्य पुत्र-पौत्र उत्पन्न हुए। शत्रुओंका नाश करनेवाला क्रूरकर्मा क्रोधवश नामक गण भी क्रूराकी ही संतान हैं ॥ ३२ ॥ दनायुषः पुनः पुत्राश्चत्वारोऽसुरपुङ्गवाः । विक्षरो बलवीरौ च वृत्रश्चैव महासुरः ॥ ३३ ॥ दनायुके असुरोंमें श्रेष्ठ चार पुत्र हुए—विक्षर, बल, वीर और महान् असुर वृत्र ॥ ३३ ॥ कालायाः प्रथिताः पुत्राः कालकल्पाः प्रहारिणः । प्रविख्याता महावीर्या दानवेषु परंतपाः ॥ ३४ ॥ कालाके विख्यात पुत्र अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करनेमें कुशल और साक्षात् कालके समान भयंकर थे। दानवोंमें उनकी बड़ी ख्याति थी। वे महान् पराक्रमी और शत्रुओंको संताप देनेवाले थे ॥ ३४ ॥ विनाशनश्च क्रोधश्च क्रोधहन्ता तथैव च । क्रोधशत्रुस्तथैवान्ये कालकेया इति श्रुताः ॥ ३५ ॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्ता तथा क्रोधशत्रु। कालकेय नामसे विख्यात दूसरे-दूसरे असुर भी कालाके ही पुत्र थे ॥ ३५ ॥ असुराणामुपाध्यायः शुक्रस्त्वृषिसुतोऽभवत् । ख्याताश्चोशनसः पुत्राश्चत्वारोऽसुरयाजकाः ॥ ३६ ॥ असुरोंके उपाध्याय (अध्यापक एवं पुरोहित) शुक्राचार्य महर्षि भृगुके पुत्र थे। उन्हें उशना भी कहते हैं। उशनाके चार पुत्र हुए, जो असुरोंके पुरोहित थे ॥ ३६ ॥ त्वष्टाधरस्तथात्रिश्च द्वावन्यौ रौद्रकर्मिणौ । तेजसा सूर्यसंकाशा ब्रह्मलोकपरायणाः ॥ ३७ ॥ इनके अतिरिक्त त्वष्टाधर तथा अत्रि ये दो पुत्र और हुए, जो रौद्र कर्म करने और करानेवाले थे। उशनाके सभी पुत्र सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्मलोकको ही परम आश्रय माननेवाले थे ॥ ३७ ॥ इत्येष वंशप्रभावः कथितस्ते तरस्विनाम् । असुराणां सुराणां च पुराणे संश्रुतो मया ॥ ३८ ॥ राजन्! मैंने पुराणमें जैसा सुन रखा है, उसके अनुसार तुमसे यह वेगशाली असुरों और देवताओंके वंशकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बताया है ॥ ३८ ॥ एतेषां यदपत्यं तु न शक्यं तदशेषतः । प्रसंख्यातुं महीपाल गुणभूतमनन्तकम् ॥ ३९ ॥ तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च तथैव गरुडारुणौ । आरुणिर्वारुणिश्चैव वैनतेयाः प्रकीर्तिताः ॥ ४० ॥ महीपाल! इनकी जो संतानें हैं, उन सबकी पूर्णरूपसे गणना नहीं की जा सकती; क्योंकि वे सब अनन्त गुने हैं। तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, आरुणि तथा वारुणि—ये