भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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और असत्य है। परंतु वानप्रस्थ मुनिका जो धर्मपालन है, वही सरलता है, वही समाधि है और वही श्रेष्ठ आचरण है ।। ५ ।।

अष्टक उवाच

केनासि हूतः प्रहितोऽसि राजन् युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चाः । कुत आयात: कतरस्यां दिशि त्व- मुताहोस्वित् पार्थिवं स्थानमस्ति ।। ६ ।।

अष्टकने पूछा— राजन्! आपको यहाँ किसने बुलाया? किसने भेजा है? आप अवस्था में तरुण, फूलोंकी मालासे सुशोभित, दर्शनीय तथा उत्तम तेजसे उद्भासित जान पड़ते हैं। आप कहाँसे आये हैं? किस दिशामें भेजे गये हैं? अथवा क्या आपके लिये इस पृथ्वीपर कोई उत्तम स्थान है? ।। ६ ।।

ययातिरुवाच

इमं भौमं नरकं क्षीणपुण्यः प्रवेष्टुमुर्वीं गगनाद् विप्रहीणः । उक्त्वाहं वः प्रपतिष्याम्यनन्तरं त्वरन्ति मां लोकपा ब्रह्मणो ये ।। ७ ।।

ययातिने कहा— मैं अपने पुण्यका क्षय होनेसे भौम नरकमें प्रवेश करनेके लिये आकाशसे गिर रहा हूँ। ब्रह्माजीके जो लोकपाल हैं, वे मुझे गिरनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं; अतः आपलोगोंसे पूछकर विदा लेकर इस पृथ्वीपर गिरूँगा ।। ७ ।।

सतां सकाशे तु वृतः प्रपात- स्ते संगता गुणवन्तस्तु सर्वे । शक्राच्च लब्धो हि वरो मयैष पतिष्यता भूमितलं नरेन्द्र ।। ८ ।।

नरेन्द्र! मैं जब इस पृथ्वीतलपर गिरनेवाला था, उस समय मैंने इन्द्रसे यह वर माँगा था कि मैं साधु पुरुषोंके समीप गिरूँ। वह वर मुझे मिला, जिसके कारण आप सब सद्गुणी संतोंका संग प्राप्त हुआ ।। ८ ।।

अष्टक उवाच

पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि स्थिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। ९ ।।