महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोगक्षेमं पार्थिव पार्थिवः सन्। दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां- श्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा ॥ १७ ॥ **ययातिने कहा—**राजन्! कोई भी राजा समान तेजस्वी होकर दूसरेसे पुण्य तथा योगक्षेमकी इच्छा न करे। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमय कार्य न करे ॥ १७ ॥
धर्म्यं मार्गं यतमानो यशस्यं कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः । न मद्विधो धर्मबुद्धिः प्रजानन् कुर्यादेवं कृपणं मां यथाऽऽत्थ ॥ १८ ॥ धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपर ही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिये, जिसके लिये आप मुझसे कह रहे हैं ॥ १८ ॥
कुर्यादपूर्वं न कृतं यदन्यै- र्विधित्समानः किमु तत्र साधु । (धर्माधर्मौ सुनिश्चित्य सम्यक् कार्याकार्येष्वप्रमत्तश्चरेद् यः । स वै धीमान् सत्यसन्धः कृतात्मा राजा भवेल्लोकपालो महिम्ना ॥ यदा भवेत् संशयो धर्मकार्ये कामार्थे वा यत्र विन्दन्ति सम्यक् । कार्यं तत्र प्रथमं धर्मकार्यं न तौ कुर्यादर्थकामौ स धर्मः ॥) ब्रुवाणमेनं नृपतिं ययातिं नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत् तम् ॥ १९ ॥ जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है, वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो। जो धर्म और अधर्मका भलीभाँति निश्चय करके कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सावधान होकर विचरता है, वही राजा बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और मनस्वी है। वह अपनी महिमासे लोकपाल होता है। जब धर्मकार्यमें संशय हो अथवा जहाँ न्यायतः काम और अर्थ दोनों आकर प्राप्त हों, वहाँ पहले धर्मकार्यका ही सम्पादन करना चाहिये, अर्थ और कामका नहीं। यही धर्म है। इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ॥ १९ ॥