महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 807, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुर्वासाजीने पृथापर आनेवाले भावी संकटका विचार करके उनके धर्मकी रक्षाके लिये उसे एक वशीकरणमन्त्र दिया और उसके प्रयोगकी विधि भी बता दी। तत्पश्चात् वे मुनि उससे बोले— ॥ ६ ॥ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रसादेन पुत्रस्तव भविष्यति ॥ ७ ॥ 'शुभे! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीके अनुग्रहसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा' ॥ ७ ॥ तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ ८ ॥ ब्रह्मर्षि दुर्वासाके यों कहनेपर कुन्तीके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। वह यशस्विनी राजकन्या यद्यपि अभी कुमारी थी, तो भी उसने मन्त्रकी परीक्षाके लिये सूर्यदेवका आवाहन किया ॥ ८ ॥ सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम् । विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महद्भुतम् ॥ ९ ॥ आवाहन करते ही उसने देखा, सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान् भास्कर आ रहे हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर निर्दोष अंगोंवाली कुन्ती चकित हो उठी ॥ ९ ॥ तां समासाद्य देवस्तु विवस्वानिदमब्रवीत् । अयमस्म्यसितापाङ्गि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १० ॥ इधर भगवान् सूर्य उसके पास आकर इस प्रकार बोले—'श्याम नेत्रोंवाली कुन्ती! यह मैं आ गया। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ १० ॥ (आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम् । विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्कं शुचिस्मिते ॥) 'भद्रे! मैं दुर्वासा ऋषिके दिये हुए मन्त्रसे प्रेरित हो तुम्हारे बुलाते ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये उपस्थित हुआ हूँ। पवित्र मुसकानवाली कुन्ती! तुम मुझे सूर्यदेव समझो।'
कुन्त्युवाच कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद् वरं विद्यां च शत्रुहन् । तद्दिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो ॥ ११ ॥ **कुन्तीने कहा—**शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभो! एक ब्राह्मणने मुझे वरदानके रूपमें देवताओंके आवाहनका मन्त्र प्रदान किया है। उसीकी परीक्षाके लिये मैंने आपका आवाहन किया था ॥ ११ ॥ एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये ।