महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**कर्णने कहा—**ब्रह्मन्! इन्द्र यदि ब्राह्मणका रूप धारण करके सचमुच मुझसे याचना करेंगे, तो मैं आपकी चेतावनीके अनुसार कैसे उन्हें वह वस्तु नहीं दूँगा। ब्राह्मण तो सदा अपना प्रिय चाहनेवाले देवताओंके लिये भी पूजनीय हैं। देवाधिदेव इन्द्र ही ब्राह्मणरूपमें आये हैं, यह जान लेनेपर भी मैं उनकी अवहेलना नहीं कर सकूँगा।
सूर्य उवाच
यद्येवं शृणु मे वीर वरं ते सोऽपि दास्यति ।
शक्तिं त्वमपि याचेथाः सर्वशस्त्रविबाधिनीम् ।।
**सूर्य बोले—**वीर! यदि ऐसी बात है तो सुनो, बदलेमें इन्द्र भी तुम्हें वर देंगे। उस समय तुम उनसे सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका निराकरण करनेवाली बरछी माँग लेना।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा द्विजः स्वप्ने तत्रैवान्तरधीयत ।
कर्णः प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत् तदा ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**स्वप्नमें यों कहकर ब्राह्मण-वेषधारी सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये। तब कर्ण जाग गया और स्वप्नकी बातोंका चिन्तन करने लगा।
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षार्थी समुपागमत् ।
कुण्डले प्रार्थयामास कवचं च महाद्युतिः ।। २७ ।।
तत्पश्चात् एक दिन महातेजस्वी देवराज इन्द्र ब्राह्मण बनकर भिक्षाके लिये कर्णके पास आये और उससे उन्होंने कवच और कुण्डलोंको माँगा ।। २७ ।।
स्वशरीरात् समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम् ।
कर्णस्तु कुण्डले छित्त्वा प्रायच्छत् कृताञ्जलिः ।। २८ ।।
तब कर्णने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रको अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कवचको शरीरसे उधेड़कर एवं दोनों कुण्डलोंको भी काटकर दे दिया ।। २८ ।।
प्रतिगृह्य तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा ।
(अहो साहसमित्येवं मनसा वासवो हसन् ।
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।।
न तं पश्यामि को ह्येतत् कर्म कर्ता भविष्यति ।
प्रीतोऽस्मि कर्मणा तेन वरं वृणु यमिच्छसि ।।
कवच और कुण्डलोंको लेकर उसके इस कर्मसे संतुष्ट हो इन्द्रने मन-ही-मन हँसते हुए कहा—'अहो! यह तो बड़े साहसका काम है। देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इनमेंसे किसीको भी मैं ऐसा साहसी नहीं देखता। भला, कौन ऐसा कार्य कर सकता है।' यों कहकर वे स्पष्ट वाणीमें बोले—'वीर! मैं तुम्हारे इस कर्मसे प्रसन्न हूँ, इसलिये तुम जो चाहो, वही वर मुझसे माँग लो।'