महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 812, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्ण उवाच
इच्छामि भगवहत्तां शक्तिं शत्रुनिबर्हणीम् ।)
कर्णने कहा— भगवन्! मैं आपकी दी हुई वह अमोघ बरछी चाहता हूँ, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली है।
वैशम्पायन उवाच
ददौ शक्तिं सुरपतिर्वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— तब देवराज इन्द्रने बदलेमें उसे अपनी ओरसे एक बरछी प्रदान की और कहा— ॥ २९ ॥
देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
यमेकं जेतुमिच्छेथाः सोऽनया न भविष्यति ॥ ३० ॥
‘वीरवर! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसोंमेंसे जिस एकको जीतना चाहोगे, वही इस शक्तिके प्रहारसे नष्ट हो जायगा’ ॥ ३० ॥
प्राङ् नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ ।
कर्णो वैकर्तनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥ ३१ ॥
पहले इस पृथ्वीपर उसका नाम वसुषेण कहा जाता था। तत्पश्चात् अपने शरीरसे कवचको कतर डालनेके कारण वह कर्ण और वैकर्तन नामसे भी प्रसिद्ध हुआ ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णसम्भवे दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४४ १/३ श्लोक हैं)