भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 814

ततः कामपरीताङ्गी सकृत् प्रचलमानसा ॥ ७ ॥ उस राजसमाजमें वे द्वितीय इन्द्रके समान विराजमान थे। निर्दोष अंगोंवाली कुन्तिभोजकुमारी शुभलक्षणा कुन्ती स्वयंवरकी रंगभूमिमें नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर मन-ही-मन उन्हें पानेके लिये व्याकुल हो उठी। उसके सब अंग कामसे व्याप्त हो गये और चित्त एकबारगी चंचल हो उठा ॥ ६-७ ॥

व्रीडमाना स्रजं कुन्ती राज्ञः स्कन्धे समासजत् । तं निशम्य वृतं पाण्डुं कुन्त्या सर्वे नराधिपाः ॥ ८ ॥ यथागतं समाजग्मुर्गजैश्चै रथैस्तथा । ततस्तस्याः पिता राजन् विवाहमकरोत् प्रभुः ॥ ९ ॥

कुन्तीने लजाते-लजाते राजा पाण्डुके गलेमें जयमाला डाल दी। सब राजाओंने जब सुना कि कुन्तीने महाराज पाण्डुका वरण कर लिया, तब वे हाथी, घोड़े एवं रथों आदि वाहनोंद्वारा जैसे आये थे, वैसे ही अपने अपने स्थानको लौट गये। राजन! तब उसके पिताने (पाण्डुके साथ शास्त्रविधिके अनुसार) कुन्तीका विवाह कर दिया ॥ ८-९ ॥

स तया कुन्तिभोजस्य दुहित्रा कुरुनन्दनः । युयुजेऽमितसौभाग्यः पौलोम्या मघवानिव ॥ १० ॥