भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 821

बहुत-से राजा तथा राजमन्त्री एकत्र होकर इस तरहकी बातें कर रहे थे। उनके साथ नगर और जनपदके लोग भी इस चर्चामें सम्मिलित थे। उन सबके हृदयमें पाण्डुके प्रति विश्वास तथा हर्षोल्लास छा रहा था॥ ३९॥

प्रत्युद्ययुश्च तं प्राप्तं सर्वे भीष्मपुरोगमाः । ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालयात् ॥ ४० ॥ आवृतं ददृशुर्हृष्टा लोकं बहुविधैर्धनैः । नानायानसमानीतै रत्नैरुच्चावचैस्तदा ॥ ४१ ॥ हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रैस्तथाविभिः । नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवाः ॥ ४२ ॥

राजा पाण्डु जब नगरके निकट आये, तब भीष्म आदि सब कौरव उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक देखा, राजा पाण्डु और उनका दल बड़े उत्साहके साथ आ रहे हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे लोग हस्तिनापुरसे थोड़ी ही दूरतक जाकर वहाँसे लौट रहे हों। उनके साथ भाँति-भाँतिके धन एवं नाना प्रकारके वाहनोंपर लादकर लाये हुए छोटे-बड़े रत्न, श्रेष्ठ हाथी, घोड़े, रथ, गौएँ, ऊँट तथा भेंड़ आदि भी थे। भीष्मके साथ कौरवोंने वहाँ जाकर देखा, तो उस धन-वैभवका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया॥ ४०—४२॥

सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः । यथार्हं मानयामास पौरजानपदानपि ॥ ४३ ॥

कौसल्याका* आनन्द बढ़ानेवाले पाण्डुने निकट आकर पितृव्य भीष्मके चरणोंमें प्रणाम किया और नगर तथा जनपदके लोगोंका भी यथायोग्य सम्मान किया॥ ४३॥

प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम् । पुत्रमाश्लिष्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ॥ ४४ ॥

शत्रुओंके राज्योंको धूलमें मिलाकर कृतकृत्य होकर लौटे हुए अपने पुत्र पाण्डुका आलिंगन करके भीष्मजी हर्षके आँसू बहाने लगे॥ ४४॥

स तूर्यशतशङ्खानां भेरीणां च महास्वनैः । हर्षयन् सर्वशः पौरान् विवेश गजसाह्वयम् ॥ ४५ ॥

सैकड़ों शंख, तुरही एवं नगारोंकी तुमुल ध्वनिसे समस्त पुरवासियोंको आनन्दित करते हुए पाण्डुने हस्तिनापुरमें प्रवेश किया॥ ४५॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदिग्विजयो द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुदिग्विजयविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११२॥