भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 981

लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिम् । ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः ॥ ३१ ॥ दर्शकोंने उन सबके ढाल-तलवारके प्रयोगोंको देखा। उस कलामें उनकी फुर्ती, चतुरता, शोभा, स्थिरता और मुट्ठीकी दृढ़ताका अवलोकन किया ॥ ३१ ॥

अथ तौ नित्यसंहृष्टौ सुयोधनवृकोदरौ । अवतीर्णौ गदाहस्तावेकशृङ्गाविवाचलौ ॥ ३२ ॥ तदनन्तर सदा एक-दूसरेको जीतनेका उत्साह रखनेवाले दुर्योधन और भीमसेन हाथमें गदा लिये रंगभूमिमें उतरे। उस समय वे एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३२ ॥

बद्धकक्षौ महाबाहू पौरुषे पर्यवस्थितौ । बृंहन्तौ वासिताहेतोः समदाविव कुञ्जरौ ॥ ३३ ॥ वे दोनों महाबाहु कमर कसकर पुरुषार्थ दिखानेके लिये आमने-सामने डटकर खड़े थे और गर्जना कर रहे थे, मानो दो मतवाले गजराज किसी हथिनीके लिये एक-दूसरेसे भिड़ना चाहते और चिग्घाड़ते हों ॥ ३३ ॥

तौ प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महाबलौ । चेरतुर्मण्डलगत्तौ समदाविव कुञ्जरौ ॥ ३४ ॥ वे दोनों महाबली योद्धा अपनी-अपनी गदाको दायें-बायें मण्डलाकार घुमाते हुए दो मदोन्मत्त हाथियोंकी भाँति मण्डलके भीतर विचरने लगे ॥ ३४ ॥

विदुरो धृतराष्ट्राय गान्धार्याः पाण्डवारणिः । न्यवेदयतां तत् सर्वं कुमाराणां विचेष्टितम् ॥ ३५ ॥ विदुर धृतराष्ट्रको और पाण्डव जननी कुन्ती गान्धारीको उन राजकुमारोंकी सारी चेष्टाएँ बताती जाती थीं ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वण्यस्त्रदर्शने त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्र-कौशलदर्शनविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४२ १/२ श्लोक हैं)


* जो उत्सव या नाटक आदिको सुविधापूर्वक देखनेके उद्देश्यसे बनाया गया हो, उसे प्रेक्षागृह या प्रेक्षाभवन कहते हैं।