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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

१२३-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार

वैशम्पायन उवाच

कुन्तीपुत्रेषु जातेषु धृतराष्ट्रात्मजेषु च ।
मद्रराजसुता पाण्डुं रहो वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब कुन्तीके तीन पुत्र उत्पन्न हो गये और धृतराष्ट्रके भी सौ पुत्र हो गये, तब माद्रीने पाण्डुसे एकान्तमें कहा— ॥ १ ॥

न मेऽस्ति त्वयि संतापो विगुणेऽपि परंतप ।
नावरत्वे वराहर्याः स्थित्वा चानघ नित्यदा ॥ २ ॥
गान्धार्याश्चैव नृपते जातं पुत्रशतं तथा ।
श्रुत्वा न मे तथा दुःखमभवत् कुरुनन्दन ॥ ३ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले निष्पाप कुरुनन्दन! आप संतान उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित हो गये, आपकी इस न्यूनता या दुर्बलताको लेकर मेरे मनमें कोई संताप नहीं है। यद्यपि मैं सदा कुन्तीदेवीकी अपेक्षा श्रेष्ठ होनेके कारण पटरानीके पदपर बैठनेकी अधिकारिणी थी, तो भी जो सदा मुझे छोटी बनकर रहना पड़ता है, इसके लिये भी मुझे कोई दुःख नहीं है। राजन्! गान्धारी तथा राजा धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र हुए हैं, वह समाचार सुनकर भी मुझे वैसा दुःख नहीं हुआ था ॥ २-३ ॥

इदं तु मे महत् दुःखं तुल्यतायामपुत्रता ।
दिष्ट्या त्विदानीं भर्तुर्मे कुन्त्यामप्यस्ति संततिः ॥ ४ ॥
‘परंतु इस बातका मेरे मनमें बहुत दुःख है कि मैं और कुन्तीदेवी दोनों समानरूपसे आपकी पत्नियाँ हैं, तो भी उन्हें तो पुत्र हुआ और मैं संतानहीन ही रह गयी। यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय मेरे प्राणनाथको कुन्तीके गर्भसे पुत्रकी प्राप्ति हो गयी है ॥ ४ ॥

यदि त्वपत्यसंतानं कुन्तिराजसुता मयि ।
कुर्यादनुग्रहो मे स्यात् तव चापि हितं भवेत् ॥ ५ ॥
‘यदि कुन्तिराजकुमारी मेरे गर्भसे भी कोई संतान उत्पन्न करा सकें, तो यह उनका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह होगा और इससे आपका भी हित हो सकता है ॥ ५ ॥

संरम्भो हि सपत्नीत्वाद् वक्तुं कुन्तिसुतां प्रति ।
यदि तु त्वं प्रसन्नो मे स्वयमेनां प्रचोदय ॥ ६ ॥

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'सौत होनेके कारण मेरे मनमें एक अभिमान है, जो कुन्तीदेवीसे कुछ निवेदन करनेमें बाधक हो रहा है; अतः यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो आप स्वयं ही मेरे लिये कुन्तीदेवीको प्रेरित कीजिये' ।। ६ ।।

पाण्डुरुवाच

ममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थः परिवर्तते । न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया ।। ७ ।। पाण्डु बोले— माद्री! यह बात मेरे मनमें भी निरन्तर घूमती रहती है, किंतु इस विषयमें तुमसे कुछ कहनेका साहस नहीं होता था; क्योंकि पता नहीं, तुम यह प्रस्ताव सुनकर प्रसन्न होओगी या बुरा मान जाओगी। यह संदेह बराबर बना रहता था ।। ७ ।। तव त्विदं मतं मत्वा प्रपतिष्याम्यतः परम् । मन्ये ध्रुवं मयोक्ता सा वचनं प्रतिपत्स्यते ।। ८ ।। परंतु आज इस विषयमें तुम्हारी सम्मति जानकर अब मैं इसके लिये प्रयत्न करूँगा। मुझे विश्वास है, मेरे कहनेपर कुन्तीदेवी निश्चय ही मेरी बात मान लेंगी ।। ८ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः कुन्तीं पुनः पाण्डुर्विविक्त इदमब्रवीत् । कुलस्य मम संतानं लोकस्य च कुरु प्रियम् ।। ९ ।। मम चापिण्डनाशाय पूर्वेषामपि चात्मनः । मत्प्रियार्थं च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम् ।। १० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा पाण्डुने एकान्तमें कुन्तीसे यह बात कही—'कल्याणि! मेरी कुलपरम्पराका विच्छेद न हो और सम्पूर्ण जगत्का प्रिय हो, ऐसा कार्य करो। मेरे तथा अपने पूर्वजोंके लिये पिण्डका अभाव न हो और मेरा भी प्रिय हो, इसके लिये तुम परम उत्तम कल्याणमय कार्य करो ।। ९-१० ।। यशसोऽर्थाय चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् । प्राप्याधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशोऽर्थिना ।। ११ ।। 'अपने यशका विस्तार करनेके लिये तुम अत्यन्त दुष्कर कर्म करो, जैसे इन्द्रने स्वर्गका साम्राज्य प्राप्त कर लेनेके बाद भी केवल यशकी कामनासे अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ।। ११ ।। तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुष्करम् । गुरून्भ्युपगच्छन्ति यशसोऽर्थाय भाविनि ।। १२ ।। 'भामिनि! मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण अत्यन्त कठोर तपस्या करके भी यशके लिये गुरुजनोंकी शरण ग्रहण करते हैं ।। १२ ।। तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः ।

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चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ॥ १३ ॥ 'सम्पूर्ण राजर्षियों तथा तपस्वी ब्राह्मणोंने भी यशके लिये छोटे-बड़े कठिन कर्म किये हैं ॥ १३ ॥ सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ॥ १४ ॥ 'अनिन्दिते! इसी प्रकार तुम भी इस माद्रीको नौकापर बिठाकर पार लगा दो; इसे भी संतति देकर उत्तम यश प्राप्त करो' ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्रीं सकृच्चिन्तय दैवतम् । तस्मात् ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम् ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महाराज पाण्डुके यों कहनेपर कुन्तीने माद्रीसे कहा—'तुम एक बार किसी देवताका चिन्तन करो, उससे तुम्हें योग्य संतानकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है' ॥ १५ ॥ ततो माद्री विचार्यैवं जगाम मनसाश्विनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ ॥ १६ ॥ तब माद्रीने मन-ही-मन कुछ विचार करके दोनों अश्विनीकुमारोंका स्मरण किया। तब उन दोनोंने आकर माद्रीके गर्भसे दो जुड़वें पुत्र उत्पन्न किये ॥ १६ ॥ नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमौ भुवि । तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी ॥ १७ ॥ उनमेंसे एकका नाम नकुल था और दूसरेका सहदेव। पृथ्वीपर सुन्दर रूपमें उन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। पहलेकी तरह उन दोनों यमल संतानोंके विषयमें भी आकाशवाणीने कहा— ॥ १७ ॥ सत्त्वरूपगुणोपेतौ भवतोऽत्यश्विनाविति । भासतस्तेजसात्यर्थं रूपद्रविणसम्पदा ॥ १८ ॥ 'ये दोनों बालक अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणोंसे सम्पन्न होंगे। अपने तेज तथा बढ़ी-चढ़ी रूप-सम्पत्तिके द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे' ॥ १८ ॥ नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः । भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिर्विशाम्पते ॥ १९ ॥ तदनन्तर शतशृंगनिवासी ऋषियोंने उन सबके नामकरण-संस्कार किये। उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी भक्ति और कर्मके अनुसार उनके नाम रखे ॥ १९ ॥ ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् । अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन् ॥ २० ॥

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कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम युधिष्ठिर, मझलेका नाम भीमसेन और तीसरेका नाम अर्जुन रखा गया ।। २० ।। पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् । माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ।। २१ ।। उन प्रसन्नचित्त ब्राह्मणोंने माद्रीपुत्रोंमेंसे जो पहले उत्पन्न हुआ, उसका नाम नकुल और दूसरेका सहदेव निश्चित किया ।। २१ ।। अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव ।। २२ ।। वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवगण प्रतिवर्ष एक-एक करके उत्पन्न हुए थे, तो भी देवस्वरूप होनेके कारण पाँच संवत्सरोंकी भाँति एक-से सुशोभित हो रहे थे ।। २२ ।। महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमाः । पाण्डुर्दृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान् महौजसः ।। २३ ।। मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः । ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ।। २४ ।। प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् । कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदयत् ।। २५ ।। वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान्, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंको देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशृंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया ।। २३—२५ ।। तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती । उक्ता सकृद् द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ।। २६ ।। राजन्! जब एकान्तमें पाण्डुने कुन्तीसे वह बात कही, तब सती कुन्ती पाण्डुसे इस प्रकार बोली—'महाराज! मैंने इसे एक पुत्रके लिये नियुक्त किया था, किंतु इसने दो पा लिये। इससे मैं ठगी गयी ।। २६ ।। बिभेम्यस्याः परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी । नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ।। २७ ।। तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषोऽस्तु वरो मम । एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ।। २८ ।। सम्भूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः । शुभलक्षणसम्पन्नाः सोमवत् प्रियदर्शनाः ।। २९ ।। 'अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि

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दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अतः राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।' इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था ॥ २७—२९ ॥

सिंहदर्पा महेष्वासाः सिंहविक्रान्तगामिनः ।
सिंहग्रीवा मनुष्येन्द्रा ववृधुर्देवविक्रमाः ॥ ३० ॥
विवर्धमानास्ते तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ ।
विस्मयं जनयामासुर्महर्षीणां समेयुषाम् ॥ ३१ ॥

उनका अभिमान सिंहके समान था, वे बड़े-बड़े धनुष धारण करते थे। उनकी चाल-ढाल भी सिंहके ही समान थी। देवताओंके समान पराक्रमी तथा सिंहकी-सी गर्दनवाले वे नरश्रेष्ठ बढ़ने लगे। उस पुण्यमय हिमालयके शिखरपर पलते और पुष्ट होते हुए वे पाण्डुपुत्र वहाँ एकत्र होनेवाले महर्षियोंको आश्चर्यचकित कर देते थे ॥ ३०-३१ ॥

(जातमात्रानुपादाय शतशृङ्गनिवासिनः ।
पाण्डोः पुत्रानमन्यन्त तापसाः स्वानिवात्मजान् ॥
ततस्तु वृष्णयः सर्वे वसुदेवपुरोगमाः ।
पाण्डुः शापभयाद् भीतः शतशृङ्गममुपेयिवान् ।
तत्रैव मुनिभिः सार्धं तापसोऽभूत् तपश्चरन् ॥
शाकमूलफलाहारस्तपस्वी नियतेन्द्रियः ।
ध्यानयोगपरो राजा बभूवेति च वादकाः ॥
प्रब्रुवन्ति स्म बहवस्तच्छ्रुत्वा शोककर्शिताः ।
पाण्डोः प्रीतिसमायुक्ताः कदा श्रोष्याम सत्कथाः ॥
इत्येवं कथयन्तस्ते वृष्णयः सह बान्धवैः ।
पाण्डोः पुत्रागमं श्रुत्वा सर्वे हर्षसमन्विताः ॥
सभाजयन्तस्तेऽन्योन्यं वसुदेवं वचोऽब्रुवन् ।

शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनि पाण्डुके पुत्रोंको जन्मकालसे ही संरक्षणमें लेकर अपने औरस पुत्रोंकी भाँति उनका लाड़-प्यार करते थे। उधर द्वारकामें वसुदेव आदि सब वृष्णिवंशी राजा पाण्डुके विषयमें इस प्रकार विचार कर रहे थे—'अहो! राजा पाण्डु किंदम मुनिके शापसे भयभीत हो शतशृंग पर्वतपर चले गये हैं और वहीं ऋषि-मुनियोंके साथ तपस्यामें तत्पर हो पूरे तपस्वी बन गये हैं। वे शाक, मूल और फल भोजन करते हैं, तपमें लगे रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं और सदा ध्यानयोगका ही साधन करते हैं। ये बातें बहुत-से संदेशवाहक मनुष्य बता रहे थे।' यह समाचार सुनकर प्रायः सभी यदुवंशी उनके प्रेमी होनेके नाते शोकमग्न रहते थे। वे सोचते थे—'कब हमें महाराज पाण्डुका शुभ संवाद

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सुननेको मिलेगा।' एक दिन अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर सब वृष्णिवंशी जब इस प्रकार पाण्डुके विषयमें कुछ बातें कर रहे थे, उसी समय उन्होंने पाण्डुके पुत्र होनेका समाचार सुना। सुनते ही सब-के-सब हर्षविभोर हो उठे और परस्पर सद्भाव प्रकट करते हुए वसुदेवजीसे इस प्रकार बोले—

वृष्णय ऊचुः

न भवेरन् क्रियाहीनाः पाण्डोः पुत्रा महायशः।
पाण्डोः प्रियहितान्वेषी प्रेषय त्वं पुरोहितम्॥
वृष्णियोंने कहा— महायशस्वी वसुदेवजी! हम चाहते हैं कि राजा पाण्डुके पुत्र संस्कारहीन न हों; अतः आप पाण्डुके प्रिय और हितकी इच्छा रखकर उनके पास किसी पुरोहितको भेजिये।

वैशम्पायन उवाच

वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम्।
युक्तानि च कुमाराणां पारिबर्हाण्यनेकणः॥
कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम्।
गाश्व रौप्यं हिरण्यं च प्रेषयामास भारत॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसुदेवजीने पुरोहितको भेजा; साथ ही उन कुमारोंके लिये उपयोगी अनेक प्रकारकी वस्त्राभूषण-सामग्री भी भेजी। कुन्ती और माद्रीके लिये भी दासी, दास, वस्त्राभूषण आदि आवश्यक सामान, गौएँ, चाँदी और सुवर्ण भिजवाये।
तानि सर्वाणि संगृह्य प्रययौ स पुरोहितः।
तमागतं द्विजश्रेष्ठं काश्यपं वै पुरोहितम्॥
पूजयामास विधिवत् पाण्डुः परपुरञ्जयः।
पृथा माद्री च संहृष्टे वसुदेवं प्रशंसताम्॥
उन सब सामग्रियोंको एकत्र करके अपने साथ ले पुरोहितने वनको प्रस्थान किया। शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले राजा पाण्डुने पुरोहित द्विजश्रेष्ठ काश्यपके आनेपर उनका विधिपूर्वक पूजन किया। कुन्ती और माद्रीने प्रसन्न होकर वसुदेवजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
ततः पाण्डुः क्रियाः सर्वाः पाण्डवानामकारयत्।
गर्भाधानादिकृत्यानि चौलोपनयनानि च॥
काश्यपः कृतवान् सर्वमुपाकर्म च भारत।
चौलोपनयनादूर्ध्वमृषभाक्षा यशस्विनः॥
वैदिकाध्ययने सर्वे समपद्यन्त पारगाः।

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तब पाण्डुने अपने पुत्रोंके गर्भाधानसे लेकर चूडाकरण और उपनयनतक सभी संस्कार-कर्म करवाये। भारत! पुरोहित काश्यपने उनके सब संस्कार सम्पन्न किये। बैलोंके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले वे यशस्वी पाण्डव चूडाकरण और उपनयनके पश्चात् उपाकर्म करके वेदाध्ययनमें लगे और उसमें पारंगत हो गये।

शर्यातेः पृषतः पुत्रः शुको नाम परंतपः ॥
येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा स महात्मा महामखैः ॥
आराध्य देवताः सर्वाः पितॄनपि महामतिः ।
शतशृङ्गे तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः ॥
तेनोपकरणश्रेष्ठैः शिक्षया चोपबृंहिताः ।
तत्प्रसादाद् धनुर्वेदे समपद्यन्त पारगाः ॥

भारत! शर्यातिवंशजके एक पुत्र पृषत् थे, जिनका नाम था शुक। वे अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करनेवाले थे। उन शुकने किसी समय अपने धनुषके बलसे जीतकर समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर अधिकार कर लिया था। अश्वमेध-जैसे सौ बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान एवं सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंकी आराधना करके परम बुद्धिमान् महात्मा राजा शुक शतशृंग पर्वतपर आकर शाक और फल-मूलका आहार करते हुए तपस्या करने लगे। उन्हीं तपस्वी नरेशने श्रेष्ठ उपकरणों और शिक्षाके द्वारा पाण्डवोंकी योग्यता बढ़ायी। राजर्षि शुकके कृपा-प्रसादसे सभी पाण्डव धनुर्वेदमें पारंगत हो गये।

गदायां पारगो भीमस्तोमरैषु युधिष्ठिरः ।
असिचर्मणि निष्णातौ यमौ सत्त्ववतां वरौ ॥
धनुर्वेदे गतः पारं सव्यसाची परंतपः ।
शुकेन समनुज्ञातो मत्समोऽयमिति प्रभो ।
अनुज्ञाय ततो राजा शक्तिं खड्गं तथा शरान् ॥
धनुश्च ददतां श्रेष्ठस्तालमात्रं महाप्रभम् ।
विपाठक्षुरनाराचान् गृध्रपत्रानलंकृतान् ॥
ददौ पार्थाय संहृष्टो महोरगसमप्रभान् ।
अवाप्य सर्वशस्त्राणि मुदितो वासवात्मजः ॥
मेने सर्वान् महीपालान् अपर्याप्तान् स्वतेजसः ।

भीमसेन गदा-संचालनमें पारंगत हुए और युधिष्ठिर तोमर फेंकनेमें। धैर्यवान् और शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ दोनों माद्रीपुत्र ढाल-तलवार चलानेकी कलामें निपुण हुए। परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेदके पारगामी विद्वान् हुए। राजन्! जब दाताओंमें श्रेष्ठ शुकने जान लिया कि अर्जुन मेरे समान धनुर्वेदके ज्ञाता हो गये, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर शक्ति, खड्ग, बाण, ताड़के समान विशाल अत्यन्त चमकीला धनुष तथा विपाठ, क्षुर एवं नाराच

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अर्जुनको दिये। विपाठ आदि सभी प्रकारके बाण गीधकी पाँखोंसे युक्त तथा अलंकृत थे। वे देखनेमें बड़े-बड़े सर्पोंके समान जान पड़ते थे। इन सब अस्त्र-शस्त्रोंको पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे यह अनुभव करने लगे कि भूमण्डलके कोई भी नरेश तेजमें मेरी समानता नहीं कर सकते।

(एकवर्षान्तरास्तेवं परस्परमरिंदमाः।
अन्ववर्धन्त पार्थाश्च माद्रीपुत्रौ तथैव च ॥)
शत्रुदमन पाण्डवोंकी आयुमें परस्पर एक-एक वर्षका अन्तर था। कुन्ती और माद्री दोनों देवियोंके पुत्र दिन-दिन बढ़ने लगे।

ते च पञ्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धनाः।
सर्वे ववृधुरल्पेन कालेनाप्स्विव नीरजाः ॥ ३२ ॥
फिर तो जैसे जलमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले जो एक सौ पाँच बालक हुए थे, वे सब थोड़े ही समयमें बढ़कर सयाने हो गये ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डवोत्पत्तौ त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डवोंकी उत्पत्तिविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)

तान् पश्यन् पर्वते रम्ये स्वबाहुबलमाश्रितः ॥ १ ॥

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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण

वैशम्पायन उवाच

दर्शनीयांस्ततः पुत्रान् पाण्डुः पञ्च महावने ।
तान् पश्यन् पर्वते रम्ये स्वबाहुबलमाश्रितः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस महान् वनमें रमणीय पर्वत-शिखरपर महाराज पाण्डु उन पाँचों दर्शनीय पुत्रोंको देखते हुए अपने बाहुबलके सहारे प्रसन्नतापूर्वक निवास करने लगे ॥ १ ॥

(पूर्णे चतुर्दशे वर्षे फाल्गुनस्य च धीमतः ।
तदा उत्तरफल्गुन्यां प्रवृत्ते स्वस्तिवाचने ॥
रक्षणे विस्मृता कुन्ती व्यग्रा ब्राह्मणभोजने ।
पुरोहितेन सहिता ब्राह्मणान् पर्यवेषयत् ॥
तस्मिन् काले समाहूय माद्रीं मदनमोहितः ।)
सुपुष्पितवने काले कदाचिन्मधुमाधवे ।
भूतसम्मोहने राजा सभार्यो व्यचरद् वनम् ॥ २ ॥
एक दिनकी बात है, बुद्धिमान् अर्जुनका चौदहवाँ वर्ष पूरा हुआ था। उनकी जन्म-तिथिको उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें ब्राह्मणलोगोंने स्वस्तिवाचन प्रारम्भ किया। उस समय कुन्तीदेवीको महाराज पाण्डुकी देखभालका ध्यान न रहा। वे ब्राह्मणोंको भोजन करानेमें लग गयीं। पुरोहितके साथ स्वयं ही उनको रसोई परोसने लगीं। इसी समय काममोहित पाण्डु माद्रीको बुलाकर अपने साथ ले गये। उस समय चैत्र और वैशाखके महीनोंकी संधिका समय था, समूचा वन भाँति-भाँतिके सुन्दर पुष्पोंसे अलंकृत हो अपनी अनुपम शोभासे समस्त प्राणियोंको मोहित कर रहा था, राजा पाण्डु अपनी छोटी रानीके साथ वनमें विचरने लगे ॥ २ ॥

पलाशैस्तिलकैश्चूतैश्चम्पकैः पारिभद्रकैः ।
अन्यैश्च बहुभिर्वृक्षैः फलपुष्पसमृद्धिभिः ॥ ३ ॥
जलस्थानैश्च विविधैः पद्मिनीभिश्च शोभितम् ।
पाण्डोर्वनं तत् सम्प्रेक्ष्य प्रजज्ञे हृदि मन्मथः ॥ ४ ॥
पलाश, तिलक, आम, चम्पा, पारिभद्रक तथा और भी बहुत-से वृक्ष फल-फूलोंकी समृद्धिसे भरे हुए थे, जो उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। नाना प्रकारके जलाशयों तथा कमलोंसे सुशोभित उस वनकी मनोहर छटा देखकर राजा पाण्डुके मनमें कामका संचार हो गया ॥ ३-४ ॥

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प्रहृष्टमनसं तत्र विचरन्तं यथामरम् । तं माद्र्यनुजगामैका वसनं बिभ्रती शुभम् ॥ ५ ॥ वे मनमें हर्षोल्लास भरकर देवताकी भाँति वहाँ विचर रहे थे। उस समय माद्री सुन्दर वस्त्र पहने अकेली उनके पीछे-पीछे जा रही थी ॥ ५ ॥ समीक्षमाणः स तु तां वयःस्थां तनुवाससम् । तस्य कामः प्रववृधे गहनेऽग्निरिवोद्गतः ॥ ६ ॥ वह युवावस्थासे युक्त थी और उसके शरीरपर झीनी-झीनी साड़ी सुशोभित थी। उसकी ओर देखते ही पाण्डुके मनमें कामनाकी आग जल उठी, मानो घने वनमें दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी हो ॥ ६ ॥ रहस्येकां तु तां दृष्ट्वा राजा राजीवलोचनाम् । न शशाक नियन्तुं तं कामं कामवशीकृतः ॥ ७ ॥ एकान्त प्रदेशमें कमलनयनी माद्रीको अकेली देखकर राजा कामका वेग रोक न सके, वे पूर्णतः कामदेवके अधीन हो गये थे ॥ ७ ॥ तत एनां बलाद् राजा निजग्राह रहो गताम् । वार्यमाणस्तया देव्या विस्फुरन्त्या यथाबलम् ॥ ८ ॥ अतः एकान्तमें मिली हुई माद्रीको महाराज पाण्डुने बलपूर्वक पकड़ लिया। देवी माद्री राजाकी पकड़से छूटनेके लिये यथाशक्ति चेष्टा करती हुई उन्हें बार-बार रोक रही थी ॥ ८ ॥ स तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्वबुध्यत । माद्रीं मैथुनधर्मेण सोऽन्वगच्छद् बलादिव ॥ ९ ॥ जीवितान्ताय कौरव्य मन्मथस्य वशं गतः । शापजं भयमुत्सृज्य विधिना सम्प्रचोदितः ॥ १० ॥ परंतु उनके मनपर तो कामका वेग सवार था; अतः उन्होंने मृगरूपधारी मुनिसे प्राप्त हुए शापका विचार नहीं किया। कुरुनन्दन जनमेजय! वे कामके वशमें हो गये थे, इसलिये प्रारब्धसे प्रेरित हो शापके भयकी अवहेलना करके स्वयं ही अपने जीवनका अन्त करनेके लिये बलपूर्वक मैथुन करनेकी इच्छा रखकर माद्रीसे लिपट गये ॥ ९-१० ॥ तस्य कामात्मनो बुद्धिः साक्षात् कालेन मोहिता । सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रणष्टा सह चेतसा ॥ ११ ॥ साक्षात् कालने कामात्मा पाण्डुकी बुद्धि मोह ली थी। उनकी बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर विचार-शक्तिके साथ-साथ स्वयं भी नष्ट हो गयी थी ॥ ११ ॥ स तया सह संगम्य भार्यया कुरुनन्दनः । पाण्डुः परमधर्मात्मा युयुजे कालधर्मणा ॥ १२ ॥

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कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले परम धर्मात्मा महाराज पाण्डु इस प्रकार अपनी धर्मपत्नी माद्रीसे समागम करके कालके गालमें पड़ गये ॥ १२ ॥

ततो माद्री समालिङ्ग्य राजानं गतचेतसम् । मुमोच दुःखजं शब्दं पुनः पुनरतीव हि ॥ १३ ॥ तब माद्री राजाके शवसे लिपटकर बार-बार अत्यन्त दुःखभरी वाणीमें विलाप करने लगी ॥ १३ ॥

सह पुत्रैस्ततः कुन्ती माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । आजग्मुः सहितास्तत्र यत्र राजा तथागतः ॥ १४ ॥ इतनेमें ही पुत्रोंसहित कुन्ती और दोनों पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार एक साथ उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ राजा पाण्डु मृतकावस्थामें पड़े थे ॥ १४ ॥

ततो माद्र्यब्रवीद् राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः । एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः ॥ १५ ॥ जनमेजय! यह देख शोकातुर माद्रीने कुन्तीसे कहा—'बहिन! आप अकेली ही यहाँ आयें। बच्चोंको वहीं रहने दें' ॥ १५ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवाधाय दारकान् । हताहमिति विक्रुश्य सहसैवाजगाम सा ॥ १६ ॥ माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्तीने सब बालकोंको वहीं रोक दिया और 'हाय! मैं मारी गयी' इस प्रकार आर्तनाद करती हुई सहसा माद्रीके पास आ पहुँची ॥ १६ ॥

दृष्ट्वा पाण्डुं च माद्रीं च शयानौ धरणीतले । कुन्ती शोकपरीताङ्गी विललाप सुदुःखिता ॥ १७ ॥ आकर उसने देखा, पाण्डु और माद्री धरतीपर पड़े हुए हैं। यह देख कुन्तीके सम्पूर्ण शरीरमें शोकाग्नि व्याप्त हो गयी और वह अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी — ॥ १७ ॥

रक्ष्यमाणो मया नित्यं वीरः सततमात्मवान् । कथं त्वामत्यतिक्रान्तः शापं जानन् वनौकसः ॥ १८ ॥ 'माद्री! मैं सदा वीर एवं जितेन्द्रिय महाराजकी रक्षा करती आ रही थी। उन्होंने मृगके शापकी बात जानते हुए भी तुम्हारे साथ बलपूर्वक समागम कैसे किया? ॥ १८ ॥

ननु नाम त्वया माद्रि रक्षितव्यो नराधिपः । सा कथं लोभितवती विजने त्वं नराधिपम् ॥ १९ ॥ 'माद्री! तुम्हें तो महाराजकी रक्षा करनी चाहिये थी। तुमने एकान्तमें उन्हें लुभाया क्यों? ॥ १९ ॥

कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् । तं विचिन्तयतः शापं प्रहर्षः समजायत ॥ २० ॥

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‘वे तो उस शापका चिन्तन करते हुए सदा दीन और उदास बने रहते थे, फिर तुझको एकान्तमें पाकर उनके मनमें कामजनित हर्ष कैसे उत्पन्न हुआ? ।। २० ।। धन्या त्वमसि बाह्लीकि मत्तो भाग्यतरा तथा । दृष्टवत्यसि यद् वक्त्रं प्रहृष्टस्य महीपतेः ॥ २१ ॥ ‘बाह्लीकराजकुमारी! तुम धन्य हो, मुझसे बड़भागिनी हो; क्योंकि तुमने हर्षोल्लाससे भरे हुए महाराजके मुखचन्द्रका दर्शन किया है’ ।। २१ ।।

माद्र्युवाच

विलपन्त्या मया देवि वार्यमाणेण चासकृत् । आत्मा न वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा ॥ २२ ॥ **माद्री बोली—**महारानी! मैंने रोते-बिलखते बार-बार महाराजको रोकनेकी चेष्टा की; परंतु वे तो उस शापजनित दुर्भाग्यको मोहके कारण मानो सत्य करना चाहते थे, इसलिये अपने-आपको रोक न सके ।। २२ ।।

वैशम्पायन उवाच

(तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कुन्ती शोकाग्नितापिता । पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ निश्चेष्टा पतिता भूमौ मोहान्नैव चचाल सा ॥ कुन्तीमुत्थाप्य माद्री च मोहेनाविष्टचेतनाम् । एह्येहीति तां कुन्तीं दर्शयामास कौरवम् ॥ पादयोः पतिता कुन्ती पुनरुत्थाय भूमिपम् । सस्मितेन तु वक्त्रेण गदन्तमिव भारत । परिरभ्य तदा मोहाद् विललापाकुलेन्द्रिया ॥ माद्री चापि समालिङ्ग्य राजानं विललाप सा ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्ती शोकाग्निसे संतप्त हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी और गिरते ही मूर्च्छा आ जानेके कारण निश्चेष्ट पड़ी रही, हिल-डुल भी न सकी। वह मूर्च्छावश अचेत हो गयी थी। माद्रीने उसे उठाया और कहा—‘बहिन! आइये, आइये!’ यों कहकर उसने कुन्तीको कुरुराज पाण्डुका दर्शन कराया। कुन्ती उठकर पुनः महाराज पाण्डुके चरणोंमें गिर पड़ी। महाराजके मुखपर मुसकराहट थी और ऐसा जान पड़ता था मानो वे अभी-अभी कोई बात कहने जा रहे हैं। उस समय मोहवश उन्हें हृदयसे लगाकर कुन्ती विलाप करने लगी। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी थीं। इसी प्रकार माद्री भी राजाका आलिंगन करके करुण विलाप करने लगी।

तं तथाधिगतं पाण्डुमृषयः सह चारणैः ।

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अभ्येत्य सहिताः सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन् ।।
अस्तं गतमिवादित्यं सुशुष्कमिव सागरम् ।
दृष्ट्वा पाण्डुं नरव्याघ्रं शोचन्ति स्म महर्षयः ।।
समानशोका ऋषयः पाण्डवाश्च बभूविरे ।
ते समाश्वासिते विप्रैः विलेपतुरनिन्दिते ।।

इस प्रकार मृत्यु-शय्यापर पड़े हुए पाण्डुके पास चारणोंसहित सभी ऋषि-मुनि जुट आये और शोकवश आँसू बहाने लगे। अस्ताचलको पहुँचे हुए सूर्य तथा एकदम सूखे हुए समुद्रकी भाँति नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर सभी महर्षि शोकमग्न हो गये। उस समय ऋषियोंको तथा पाण्डुपुत्रोंको समानरूपसे शोकका अनुभव हो रहा था। ब्राह्मणोंने पाण्डुकी दोनों सती-साध्वी रानियोंको समझा-बुझाकर बहुत आश्वासन दिया, तो भी उनका विलाप बंद नहीं हुआ।

कुन्त्युवाच

हा राजन् कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम् ।।
हा राजन् मम मन्दायाः कथं माद्रीं समेत्य वै ।
निधनं प्राप्तवान् राजन् मद्भाग्यपरिसंक्षयात् ।।
युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ ।
कस्य हित्वा प्रियान् पुत्रान् प्रयातोऽसि विशाम्पते ।।
नूनं त्वां त्रिदशा देवाः प्रतिनन्दन्ति भारत ।
यथा हि तप उग्रं ते चरितं विप्रसंसदि ।।
आवाभ्यां सहितो राजन् गमिष्यसि दिवं शुभम् ।
आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम् ।।

**कुन्ती बोली—**हा! महाराज! आप हम दोनोंको किसे सौंपकर स्वर्गलोकमें जा रहे हैं। हाय! मैं कितनी भाग्यहीना हूँ। मेरे राजा! आप किसलिये अकेली माद्रीसे मिलकर सहसा कालके गालमें चले गये। मेरा भाग्य नष्ट हो जानेके कारण ही आज यह दिन देखना पड़ा है। प्रजानाथ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव—इन प्यारे पुत्रोंको किसके जिम्मे छोड़कर आप चले गये? भारत! निश्चय ही देवता आपका अभिनन्दन करते होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणोंकी मण्डलीमें रहकर कठोर तपस्या की है। अजमीढकुलनन्दन! आपके पूर्वजोंने पुण्य-कर्मोंद्वारा जिस गतिको प्राप्त किया है, उसी शुभ स्वर्गीय गतिको आप हम दोनों पत्नियोंके साथ प्राप्त करेंगे।

वैशम्पायन उवाच

(विलपित्वा भृशं त्वेवं निःसंज्ञे पतिते भुवि ।
युधिष्ठिरमुखाः सर्वे पाण्डवा वेदपारगाः ।

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तेऽप्यागत्य पितुर्मूले निःसंज्ञाः पतिता भुवि ॥
पाण्डोः पादौ परिष्वज्य विलपन्ति स्म पाण्डवाः ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार अत्यन्त विलाप करके कुन्ती और माद्री दोनों अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डव वेदविद्यामें पारंगत हो चुके थे, वे भी पिताके समीप आकर संज्ञाशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। सभी पाण्डव पाण्डुके चरणोंको हृदयसे लगाकर विलाप करने लगे।

कुन्त्युवाच

अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम ।
अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ॥ २३ ॥
अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् ।
उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान् ॥ २४ ॥
अवाप्य पुत्राँल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये ।
कुन्तीने कहा— माद्री! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्मके ज्येष्ठ फलपर भी मेरा ही अधिकार है। जो अवश्यम्भावी बात है, उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्युके वशमें पड़े हुए अपने स्वामीका अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चोंका पालन करो। पुत्रोंको पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है; अब मैं पतिके साथ दग्ध होकर वीरपत्नीका पद पाना चाहती हूँ ॥ २३-२४ ॥

माद्र्युवाच

अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् ।
न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ॥ २५ ॥
माद्री बोली— रणभूमिसे कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पतिदेवके साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होनेवाले कामभोगसे मैं तृप्त नहीं हो सकी हूँ। आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनी चाहिये ॥ २५ ॥

मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद् भरतसत्तमः ।
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ॥ २६ ॥
ये भरतश्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः मुझे किसी प्रकार परलोकमें पहुँचकर उनकी उस कामवासनाकी निवृत्ति करनी चाहिये ॥ २६ ॥

न चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेषं सुनेषु ते ।
वृत्तिमार्थे चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम् ॥ २७ ॥
आर्ये! मैं आपके पुत्रोंके साथ अपने सगे पुत्रोंकी भाँति बर्ताव नहीं कर सकूँगी। उस दशामें मुझे पाप लगेगा ॥ २७ ॥

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तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः ॥ २८ ॥ अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही पालन कीजियेगा। इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्युके अधीन हुए हैं ॥ २८ ॥

वैशम्पायन उवाच

(ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान् सत्यविक्रमान् । ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विनः ॥ सुभगे बालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन । पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्रं परंतपान् ॥ अधर्मैश्वर्यजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान् । स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ॥ कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । माद्र्याश्च बलिनां श्रेष्ठः शल्यो भ्राता महारथः ॥ भर्त्रा तु मरणं सार्धं फलवन्नात्र संशयः । युवाभ्यां दुष्करं चैतद् वदन्ति द्विजपुङ्गवाः ॥ मृते भर्तरि या साध्वी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । यमैश्च नियमैः श्रान्ता मनोवाक्कायजैः शुभैः ॥ व्रतोपवासनियमैः कृच्छ्रैश्चान्द्रायणादिभिः । भूशय्यां क्षारलवणवर्जनं चैकभोजनम् ॥ येन केनापि विधिना देहशोषणतत्परा । देहपोषणसंयुक्ता विषयैर्हृतचेतना ॥ देहव्ययेन नरकं महदाप्नोत्यसंशयः । तस्मात्संशोषयेद् देहं विषया नाशमाप्नुयुः ॥ भर्तारं चिन्तयन्ती सा भर्तारं निस्तरेच्छुभा । तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ॥ तस्माज्जीवितमेवैतद् युवयोर्विद्व शोभनम् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—तदनन्तर तपस्वी ऋषियोंने सत्यपराक्रमी पाण्डवोंको धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्रीको भी आश्वासन देते हुए कहा—'सुभगे! तुम दोनोंके पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हमलोग शत्रुदमन पाण्डवोंको कौरव राष्ट्रकी राजधानीमें पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धनके लिये लोभ रखता है, अतः वह कभी पाण्डवोंके साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता। कुन्तीके रक्षक एवं सहायक वृष्णिवंशी और राजा कुन्तिभोज हैं तथा माद्रीके बलवानोंमें श्रेष्ठ

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महारथी शल्य उसके भाई हैं। इसमें संदेह नहीं कि पतिके साथ मृत्यु स्वीकार करना पत्नीके लिये महान् फलदायक होता है; तथापि तुम दोनोंके लिये यह कार्य अत्यन्त कठोर है, यह बात सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं। जो स्त्री साध्वी होती है, वह अपने पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद ब्रह्मचर्यके पालनमें अविचलभावसे लगी रहती है, यम और नियमोंके पालनका क्लेश सहन करती है और मन, वाणी एवं शरीरद्वारा किये जानेवाले शुभ कर्मों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रत, उपवास और नियमोंका अनुष्ठान करती है। वह क्षार (पापड़ आदि) और लवणका त्याग करके एक बार ही भोजन करती और भूमिपर शयन करती है। वह जिस किसी प्रकारसे अपने शरीरको सुखानेके प्रयत्नमें लगी रहती है। किंतु विषयोंके द्वारा नष्ट हुई बुद्धिवाली जो नारी देहको पुष्ट करनेमें ही लगी रहती है, वह तो इस (दुर्लभ मनुष्य-) शरीरको व्यर्थ ही नष्ट करके निःसंदेह महान् नरकको प्राप्त होती है। अतः साध्वी स्त्रीको उचित है कि वह अपने शरीरको सुखाये, जिससे सम्पूर्ण विषय-कामनाएँ नष्ट हो जायँ। इस प्रकार उपर्युक्त धर्मका पालन करनेवाली जो शुभलक्षणा नारी अपने पतिदेवका चिन्तन करती रहती है, वह अपने पतिका भी उद्धार कर देती है। इस तरह वह स्वयं अपनेको, अपने पतिको एवं पुत्रको भी संसारसे तार देती है। अतः हमलोग तो यही अच्छा मानते हैं कि तुम दोनों जीवन धारण करो'।

कुन्त्युवाच

यथा पाण्डोश्च निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च ।
आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत् तथा ॥
यथाऽऽहुर्भगवन्तो हि तन्मन्ये शोभनं परम् ।
भर्तुश्च मम पुत्राणां मम चैव न संशयः ॥

**कुन्ती बोली—**महात्माओ! हमारे लिये महाराज पाण्डुकी आज्ञा जैसे शिरोधार्य है, उसी प्रकार आप सब ब्राह्मणोंकी भी है। आपका आदेश मैं सिर-माथे रखती हूँ। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगी। पूज्यपाद विप्रगण जैसा कहते हैं, उसीको मैं अपने पति, पुत्रों तथा अपने-आपके लिये भी परम कल्याणकारी समझती हूँ—इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

माद्र्युवाच

कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे ।
अस्या हि न समा बुद्ध्या यद्यपि स्यादरुन्धती ॥
कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च ।
नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ॥
साहं भर्तारमन्वेष्ये अतृप्ता नन्वहं तथा ।
भर्तृलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ॥
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यधर्मस्य धीमतः ।

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पादौ परिचरिष्यामि तदार्ये ह्यनुमन्यताम् ॥

माद्रीने कहा— कुन्तीदेवी सभी पुत्रोंके योग-क्षेमके निर्वाहमें—पालन-पोषणमें समर्थ हैं। कोई भी स्त्री, चाहे वह अरुन्धती ही क्यों न हो, बुद्धिमें इनकी समानता नहीं कर सकती। वृष्णिवंशके लोग तथा महाराज कुन्तिभोज भी कुन्तीके रक्षक एवं सहायक हैं। बहिन! पुत्रोंके पालन-पोषणकी शक्ति जैसी आपमें है, वैसी मुझमें नहीं है। अतः मैं पतिका ही अनुगमन करना चाहती हूँ। पतिके संयोग-सुखसे मेरी तृप्ति भी नहीं हुई है। अतः आप बड़ी महारानीसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे पतिलोकमें जानेकी आज्ञा दें। मैं वहीं धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान् पतिके चरणोंकी सेवा करूँगी। आर्ये! आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा महाराज मद्रराजसुता शुभा ।
ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाभिप्रणम्य च ॥
अभिवाद्य ऋषीन् सर्वान् परिष्वज्य च पाण्डवान् ।
मूर्ध्न्युपाघ्राय बहुशः पार्थानात्मसुतौ तथा ॥
हस्ते युधिष्ठिरं गृह्य माद्री वाक्यमभाषत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज! यों कहकर मद्रदेशकी राजकुमारी सती-साध्वी माद्रीने कुन्तीको प्रणाम करके अपने दोनों जुड़वें पुत्र उन्हींको सौंप दिये। तत्पश्चात् उसने महर्षियोंको मस्तक नवाकर पाण्डवोंको हृदयसे लगा लिया और बारंबार कुन्तीके तथा अपने पुत्रोंके मस्तक सूँघकर युधिष्ठिरका हाथ पकड़कर कहा।

माद्र्युवाच

कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः ।
युधिष्ठिरः पिता ज्येष्ठश्चतुर्णां धर्मतः सदा ॥
वृद्धानुशासने सक्ताः सत्यधर्मपरायणाः ।
तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ॥
तस्मात् सर्वे कुरुध्वं वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिताः ॥

माद्री बोली— बच्चो! कुन्तीदेवी ही तुम सबोंकी असली माता हैं, मैं तो केवल दूध पिलानेवाली धाय थी। तुम्हारे पिता तो मर गये। अब बड़े भैया युधिष्ठिर ही धर्मतः तुम चारों भाइयोंके पिता हैं। तुम सब बड़े-बूढ़ों—गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना और सत्य एवं धर्मके पालनसे कभी मुँह न मोड़ना। ऐसा करनेवाले लोग कभी नष्ट नहीं होते और न कभी उनकी पराजय ही होती है। अतः तुम सब भाई आलस्य छोड़कर गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहना।

वैशम्पायन उवाच

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ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनः पुनः । आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तथा ॥ धन्या त्वमसि वार्ष्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया । वीर्यं तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ॥ कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् । ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ॥ स्वर्गं दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् । आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ॥ ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ॥ धर्मं स्वर्गं च कीर्तिं च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् । यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ॥ वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, क्लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा—'वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं। आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंके समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो। देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। समस्त नैसर्गिक सद्गुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैसा सहयोग आप इस अवसरपर करें। मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें'। बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ॥ अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते । भर्त्रा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ॥ संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ॥) राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् । दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु ॥ २९ ॥ तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्गद वाणीमें कहा—'कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी। विशाललोचने! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो। भामिनि! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षोंतक प्रसन्न रहो।' माद्री बोली—'मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये। बड़ी बहिन! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें ॥ २९ ॥

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दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम । अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ॥ ३० ॥ 'मेरे पुत्रोंका हित चाहती हुई सावधान रहकर उनका पालन-पोषण करें। इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे आपसे कहनेयोग्य नहीं जान पड़ती' ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् । मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी ॥ ३१ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कुन्तीसे यह कहकर पाण्डुकी यशस्विनी धर्मपत्नी माद्री चिताकी आगपर रखे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डुके शवके साथ स्वयं भी चितापर जा बैठी ॥ ३१ ॥

(ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः । हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान् ॥ उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः । अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ॥ काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् ॥ तदनन्तर प्रेतकर्मके पारंगत विद्वान् पुरोहित काश्यपने स्नान करके सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जलसे भरा घड़ा और फरसा आदि वस्तुओंको एकत्र करके तपस्वी मुनियोंद्वारा अश्वमेधकी अग्नि मँगवायी और उसे चारों ओरसे चितासे छुलाकर यथायोग्य शास्त्रीय विधिसे पाण्डुका दाह-संस्कार करवाया।

अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ॥ अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः । तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह ॥) भाइयोंसहित निष्पाप युधिष्ठिरने नूतन वस्त्र धारण करके पुरोहितकी आज्ञाके अनुसार जलांजलि देनेका कार्य पूरा किया। शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों और चारणोंने आदरणीय राजा पाण्डुके परलोक-सम्बन्धी सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किये।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डूपरमे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके परलोकगमनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५० १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८१ १/२ श्लोक हैं)

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