महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें ज
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश
जनमेजय उवाच
य एते कीर्तिता ब्रह्मन् ये चान्ये नानुकीर्तिताः ।
सम्यक् ताञ्छ्रोतुमिच्छामि राजंश्चान्यान् सहस्रशः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— ब्रह्मन्! आपने यहाँ जिन राजाओंके नाम बताये हैं और जिन दूसरे नरेशोंके नाम यहाँ नहीं लिये हैं, उन सब सहस्रों राजाओंका मैं भलीभाँति परिचय सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
यदर्थमिह सम्भूता देवकल्पा महारथाः ।
भुवि तन्मे महाभाग सम्यगाख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
महाभाग! वे देवतुल्य महारथी इस पृथ्वीपर जिस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उत्पन्न हुए थे, उसका यथावत् वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
रहस्यं खल्विदं राजन् देवानामिति नः श्रुतम् ।
तत्तु ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! यह देवताओंका रहस्य है, ऐसा मैंने सुन रखा है। स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार करके आज उसी रहस्यका तुमसे वर्णन करूँगा ॥ ३ ॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा ।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ॥ ४ ॥
तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन् सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियरहित करके उत्तम पर्वत महेन्द्रपर तपस्या की थी। उस समय जब भृगुनन्दनने इस लोकको क्षत्रियशून्य कर दिया था, क्षत्रिय-नारियोंने पुत्रकी अभिलाषासे ब्राह्मणोंकी शरण ग्रहण की थी ॥ ४-५ ॥
ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।
ऋतावृत्तौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा ॥ ६ ॥ नररत्न! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकालमें ही उनके साथ मिलते थे; न तो कामवश और न बिना ऋतुकालके ही ॥ ६ ॥ तेभ्यश्च लेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः । ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ॥ ७ ॥ कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये । एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥ ८ ॥ जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम् । चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्मणोत्तराः ॥ ९ ॥ राजन्! उन सहस्रों क्षत्राणियोंने ब्राह्मणोंसे गर्भ धारण किया और पुनः क्षत्रियकुलकी वृद्धिके लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों तथा कुमारियोंको जन्म दिया। इस प्रकार तपस्वी ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्राणियोंके गर्भसे धर्मपूर्वक क्षत्रिय-संतानकी उत्पत्ति और वृद्धि हुई। वे सब संतानें दीर्घायु होती थीं। तदनन्तर जगत्में पुनः ब्राह्मणप्रधान चारों वर्ण प्रतिष्ठित हुए ॥ ७—९ ॥ अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा । तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ १० ॥ ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत् तथा भरतर्षभ । ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ॥ ११ ॥ उस समय सब लोग ऋतुकालमें ही पत्नीसमागम करते थे; केवल कामनावश या ऋतुकालके बिना नहीं करते थे। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिकी योनिमें पड़े हुए जीव भी ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रियोंसे संयोग करते थे। भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्मका आश्रय लेनेसे सब लोग सहस्र एवं शत वर्षोंतक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करते थे ॥ १०-११ ॥ ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः । आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ॥ १२ ॥ भूपाल! उस समयकी प्रजा धर्म एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहती थी; अतः सभी लोग रोगों तथा मानसिक चिन्ताओंसे मुक्त रहते थे ॥ १२ ॥ अथेमां सागरापाङ्गीं गां गजेन्द्रगताखिलाम् । अध्यतिष्ठत् पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम् ॥ १३ ॥ गजराजके समान गमन करनेवाले राजा जनमेजय! तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्रसे घिरी हुई पर्वत, वन और नगरोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर पुनः क्षत्रियजातिका ही अधिकार हो गया ॥ १३ ॥ प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम् ।
ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम् ॥ १४ ॥
जब पुनः क्षत्रिय शासक धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करने लगे, तब ब्राह्मण आदि वर्णोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ १४ ॥
कामक्रोधोद्भवान् दोषान् निरस्य च नराधिपाः ।
धर्मेण दण्डं दण्ड्येषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन् ॥ १५ ॥
उन दिनों राजालोग काम और क्रोधजनित दोषोंको दूर करके दण्डनीय अपराधियोंको धर्मानुसार दण्ड देते हुए पृथ्वीका पालन करते थे ॥ १५ ॥
तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्राक्षः शतक्रतुः ।
स्वादु देशे च काले च वर्षेणापालयत् प्रजाः ॥ १६ ॥
इस तरह धर्मपरायण क्षत्रियोंके शासनमें सारा देश-काल अत्यन्त रुचिकर प्रतीत होने लगा। उस समय सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र समयपर वर्षा करके प्रजाओंका पालन करते थे ॥ १६ ॥
न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप ।
न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनः ॥ १७ ॥
राजन्! उन दिनों कोई भी बाल्यावस्थामें नहीं मरता था। कोई भी पुरुष युवावस्था प्राप्त हुए बिना स्त्री-सुखका अनुभव नहीं करता था ॥ १७ ॥
एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ ।
इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! ऐसी व्यवस्था हो जानेसे समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी दीर्घकालतक जीवित रहनेवाली प्रजाओंसे भर गयी ॥ १८ ॥
ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः ।
साङ्गोपनिषदन् वेदान् विप्राश्चाधीयते तदा ॥ १९ ॥
क्षत्रियलोग बहुत-सी दक्षिणावाले बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन करते थे। ब्राह्मण अंगों और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करते थे ॥ १९ ॥
न च विक्रीणते ब्रह्म ब्राह्मणाश्च तदा नृप ।
न च शूद्रसमभ्याशे वेदानुच्चारयन्त्युत ॥ २० ॥
राजन्! उस समय ब्राह्मण न तो वेदका विक्रय करते और न शूद्रोंके निकट वेदमन्त्रोंका उच्चारण ही करते थे ॥ २० ॥
कारयन्तः कृषिं गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविह ।
युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशाङ्गांश्चाप्यजीवयन् ॥ २१ ॥
वैश्यगण बैलोंद्वारा इस पृथ्वीपर दूसरोंसे खेती कराते हुए भी स्वयं उनके कंधेपर जुआ नहीं रखते थे—उन्हें बोझ ढोनेमें नहीं लगाते थे और दुर्बल अंगोंवाले निकम्मे पशुओंको भी दाना-घास देकर उनके जीवनकी रक्षा करते थे ॥ २१ ॥
फेनपांश्च तथा वत्सान् न दुहन्ति स्म मानवाः । न कूटमानैर्वणिजः पण्यं विक्रीणते तदा ॥ २२ ॥ जबतक बछड़े केवल दूधपर रहते, घास नहीं चरते, तबतक मनुष्य गौओंका दूध नहीं दुहते थे। व्यापारीलोग बेचने योग्य वस्तुओंका झूठे माप-तौलद्वारा विक्रय नहीं करते थे ॥ २२ ॥
कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः । धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥ २३ ॥ नरश्रेष्ठ! सब मनुष्य धर्मकी ही ओर दृष्टि रखकर धर्ममें ही तत्पर हो धर्मयुक्त कर्मोंका ही अनुष्ठान करते थे ॥ २३ ॥
स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप । एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न ह्रसते क्वचित् ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे। नरश्रेष्ठ! इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ॥ २४ ॥
काले गावः प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ । भवन्त्यृतुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ॥ २५ ॥ भरतश्रेष्ठ! गौएँ तथा स्त्रियाँ भी ठीक समयपर ही संतान उत्पन्न करती थीं। ऋतु आनेपर ही वृक्षोंमें फूल और फल लगते थे ॥ २५ ॥
एवं कृतयुगे सम्यग् वर्तमाने तदा नृप । आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिर्भृशम् ॥ २६ ॥ नरेश्वर! इस तरह उस समय सब ओर सत्ययुग छा रहा था। सारी पृथ्वी नाना प्रकारके प्राणियोंसे खूब भरी-पूरी रहती थी ॥ २६ ॥
एवं समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ । असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ॥ २७ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण मानव-जगत् बहुत प्रसन्न था। मनुजेश्वर! इसी समय असुरलोग राजपत्नियोंके गर्भसे जन्म लेने लगे ॥ २७ ॥
आदित्यैर्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि । ऐश्वर्याद् भ्रंशिताः स्वर्गात् सम्बभूवुः क्षिताविह ॥ २८ ॥ उन दिनों अदितिके पुत्रों (देवताओं)-द्वारा दैत्यगण अनेक बार युद्धमें पराजित हो चुके थे। स्वर्गके ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होनेपर वे इस पृथ्वीपर ही जन्म लेने लगे ॥ २८ ॥
इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः । जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ॥ २९ ॥ प्रभो! यहीं रहकर देवत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे वे मनस्वी असुर भूतलपर मनुष्यों तथा भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें जन्म लेने लगे ॥ २९ ॥
गोष्वश्वेषु च राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिषेषु च । क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ॥ ३० ॥ जातैरिह महीपाल जायमानैश्च तैर्मही । न शशाकात्मनाऽऽत्मानमियं धारयितुं धरा ॥ ३१ ॥ राजेन्द्र! गौओं, घोड़ों, गदहों, ऊँटों, भैंसों, कच्चे मांस खानेवाले पशुओं, हाथियों और मृगोंकी योनिमें भी यहाँ असुरोंने जन्म लिया और अभीतक वे जन्म धारण करते जा रहे थे। उन सबसे यह पृथ्वी इस प्रकार भर गयी कि अपने-आपको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ३०-३१ ॥
अथ जाता महीपालाः केचिद् बहुमदान्विताः । दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोक इह च्युताः ॥ ३२ ॥ वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् । इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ॥ ३३ ॥ स्वर्गसे इस लोकमें गिरे हुए तथा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए कितने ही दैत्य और दानव अत्यन्त मदसे उन्मत्त रहते थे। वे पराक्रमी होनेके साथ ही अहंकारी भी थे। अनेक प्रकारके रूप धारण कर अपने शत्रुओंका मान-मर्दन करते हुए समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर विचरते रहते थे ॥ ३२-३३ ॥
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ्छूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् । अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ॥ ३४ ॥ वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंको भी सताया करते थे। अन्यान्य जीवोंको भी अपने बल और पराक्रमसे पीड़ा देते थे ॥ ३४ ॥
त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते । विचेरुः सर्वशो राजन् महीं शतसहस्रशः ॥ ३५ ॥ राजन्! वे असुर लाखोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे और समस्त प्राणियोंको डराते-धमकाते तथा उनकी हिंसा करते हुए भूमण्डलमें सब ओर घूमते रहते थे ॥ ३५ ॥
आश्रमस्थान् महर्षींश्च धर्षयन्तस्ततस्ततः । अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदबलेन च ॥ ३६ ॥ वे वेद और ब्राह्मणके विरोधी, पराक्रमके नशेमें चूर तथा अहंकार और बलसे मतवाले होकर इधर-उधर आश्रमवासी महर्षियोंका भी तिरस्कार करने लगे ॥ ३६ ॥
एवं वीर्यबलोत्सिक्तैर्भूरियन्तैर्महासुरैः । पीड्यमाना मही राजन् ब्रह्माणमुपचक्रमे ॥ ३७ ॥ राजन्! जब इस प्रकार बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त महादैत्य विशेष यत्नपूर्वक इस पृथ्वीको पीड़ा देने लगे, तब यह ब्रह्माजीकी शरणमें जानेको उद्यत हुई ॥ ३७ ॥
न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् ।
तदा धारयितुं शेकुः संक्रान्तां दानवैर्बलात् ॥ ३८ ॥ ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता । जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ॥ ३९ ॥ सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः । ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ॥ ४० ॥ दानवोंने बलपूर्वक जिसपर अधिकार कर लिया था, पर्वतों और वृक्षोंसहित उस पृथ्वीको उस समय कच्छप और दिग्गज आदिकी संगठित शक्तियाँ तथा शेषनाग भी धारण करनेमें समर्थ न हो सके। महीपाल! तब असुरोंके भारसे आतुर तथा भयसे पीड़ित हुई पृथ्वी सम्पूर्ण भूतोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें उपस्थित हुई। ब्रह्मलोकमें जाकर पृथ्वीने उन लोकस्रष्टा अविनाशी देव भगवान् ब्रह्माजीका दर्शन किया, जिन्हें महाभाग देवता, द्विज और महर्षि घेरे हुए थे ॥ ३८—४० ॥
गन्धर्वैरप्सतेभिश्च देवकर्मसु निष्ठितैः । वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ॥ ४१ ॥ देवकर्ममें संलग्न रहनेवाले अप्सराएँ और गन्धर्व उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करते थे। पृथ्वीने उनके निकट जाकर प्रणाम किया ॥ ४१ ॥
अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी । संनिधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ॥ ४२ ॥ तत् प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयम्भुवः । पूर्वमेवाभवद् राजन् विदितं परमेष्ठिनः ॥ ४३ ॥ भारत! तदनन्तर शरण चाहनेवाली भूमीने समस्त लोकपालोंके समीप अपना सारा दुःख ब्रह्माजीसे निवेदन किया। राजन्! स्वयम्भू ब्रह्मा सबके कारणरूप हैं, अतः पृथ्वीका जो आवश्यक कार्य था वह उन्हें पहलेसे ही ज्ञात हो गया था ॥ ४२-४३ ॥
स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्बुध्येत भारत । ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम् ॥ ४४ ॥ भारत! भला जो जगत्के स्रष्टा हैं, वे देवताओं और असुरोंसहित समस्त जगत्का सम्पूर्ण मनोगत भाव क्यों न समझ लें ॥ ४४ ॥
तामुवाच महाराज भूमिं भूमिपतिः प्रभुः । प्रभवः सर्वभूतानामीशः शम्भुः प्रजापतिः ॥ ४५ ॥ महाराज! जो इस भूमिके पालक और प्रभु हैं, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा समस्त प्राणियोंके अधीश्वर हैं, वे कल्याणमय प्रजापति ब्रह्माजी उस समय भूमिसे इस प्रकार बोले ॥ ४५ ॥
ब्रह्मोवाच
यदर्थमभिसम्प्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे ।
तदर्थं संनियोक्ष्यामि सर्वानैव दिवौकसः ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीने कहा— वसुन्धरे! तुम जिस उद्देश्यसे मेरे पास आयी हो, उसकी सिद्धिके लिये मैं सम्पूर्ण देवताओंको नियुक्त कर रहा हूँ ॥ ४६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा स महीं देवो ब्रह्मा राजन् विसृज्य च ।
आदिदेश तदा सर्वान् विबुधान् भूतकृत् स्वयम् ॥ ४७ ॥
अस्या भूमेर्निरसितुं भारं भागैः पृथक् पृथक् ।
अस्यामेव प्रसूयध्वं विरोधायेति चाब्रवीत् ॥ ४८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने ऐसा कहकर उस समय पृथ्वीको तो विदा कर दिया और समस्त देवताओंको यह आदेश दिया—'देवताओ! तुम इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने-अपने अंशसे पृथ्वीके विभिन्न भागोंमें पृथक्-पृथक् जन्म ग्रहण करो। वहाँ असुरोंसे विरोध करके अभीष्ट उद्देश्यकी सिद्धि करनी होगी' ॥ ४७-४८ ॥
तथैव स समानीय गन्धर्वाप्सरसां गणान् ।
उवाच भगवान् सर्वानिदं वचनमर्थवत् ॥ ४९ ॥
इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने सम्पूर्ण गन्धर्वों और अप्सराओंको भी बुलाकर यह अर्थसाधक वचन कहा ॥ ४९ ॥
ब्रह्मोवाच
स्वैः स्वैरंशैः प्रसूयध्वं यथेष्टं मानुषेषु च ।
अथ शक्रादयः सर्वे श्रुत्वा सुरगुरोर्वचः ।
तथ्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ॥ ५० ॥
ब्रह्माजी बोले— तुम सब लोग अपने-अपने अंशसे मनुष्योंमें इच्छानुसार जन्म ग्रहण करो। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने देवगुरु ब्रह्माजीकी सत्य, अर्थसाधक और हितकर बात सुनकर उस समय उसे शिरोधार्य कर लिया ॥ ५० ॥
अथ ते सर्वशोंऽशैः स्वैर्गन्तुं भूमिं कृतक्षणाः ।
नारायणममित्रघ्नं वैकुण्ठमुपचक्रमुः ॥ ५१ ॥
अब वे अपने-अपने अंशोंसे भूलोकमें सब ओर जानेका निश्चय करके शत्रुओंका नाश करनेवाले भगवान् नारायणके समीप वैकुण्ठधाममें जानेको उद्यत हुए ॥ ५१ ॥
यः स चक्रगदापाणिः पीतवासाः शितिप्रभः ।
पद्मनाभः सुरारिघ्नः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ५२ ॥
जो अपने हाथोंमें चक्र और गदा धारण करते हैं, पीताम्बर पहनते हैं, जिनके अंगोंकी कान्ति श्याम रंगकी है, जिनकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव हुआ है, जो देव-शत्रुओंके नाशक तथा विशाल और मनोहर नेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५२ ॥
प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथो महाबलः ।
श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ५३ ॥
जो प्रजापतियोंके भी पति, दिव्यस्वरूप, देवताओंके रक्षक, महाबली, श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित, इन्द्रियोंके अधिष्ठाता तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हैं ॥ ५३ ॥
तं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् ।
अंशेनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः ॥ ५४ ॥
उन भगवान् पुरुषोत्तमके पास जाकर इन्द्रने उनसे कहा—‘प्रभो! आप पृथ्वीका शोधन (भार-हरण) करनेके लिये अपने अंशसे अवतार ग्रहण करें।’ तब श्रीहरिने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
* ‘वैश्यायां क्षत्रियाज्जातः करणः परिकीर्तितः ।’ (वैश्य माता और क्षत्रिय पितासे उत्पन्न पुत्र ‘करण’ कहलाता है) इस धर्मशास्त्रीय वचनके अनुसार युयुत्सुकी ‘करण’ संज्ञा बतायी गयी है।
(सम्भवपर्व)
(सम्भवपर्व)
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण
वैशम्पायन उवाच
अथ नारायणेनेन्द्रश्चकार सह संविदम् ।
अवतर्तुं महीं स्वर्गादंशतः सहितः सुरैः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! देवताओंसहित इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ स्वर्ग एवं वैकुण्ठसे पृथ्वीपर अंशतः अवतार ग्रहण करनेके सम्बन्धमें कुछ सलाह की ॥ १ ॥
आदिश्य च स्वयं शक्रः सर्वानैव दिवौकसः ।
निर्जगाम पुनस्तस्मात् क्षयान्नारायणस्य ह ॥ २ ॥
तत्पश्चात् सभी देवताओंको तदनुसार कार्य करनेके लिये आदेश देकर वे भगवान् नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठधामसे पुनः चले आये ॥ २ ॥
तेऽमरारिविनाशाय सर्वलोकहिताय च ।
अवतेरुः क्रमेणैव महीं स्वर्गाद् दिवौकसः ॥ ३ ॥
तब देवतालोग सम्पूर्ण लोकोंके हित तथा राक्षसोंके विनाशके लिये स्वर्गसे पृथ्वीपर आकर क्रमशः अवतीर्ण होने लगे ॥ ३ ॥
ततो ब्रह्मर्षिवंशेषु पार्थिवर्षिकुलेषु च ।
जज्ञिरे राजशार्दूल यथाकामं दिवौकसः ॥ ४ ॥
नृपश्रेष्ठ! वे देवगण अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मर्षियों अथवा राजर्षियोंके वंशमें उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥
दानवान् राक्षसांश्चैव गन्धर्वान् पन्नगांस्तथा ।
पुरुषादानि चान्यानि जघ्नुः सत्त्वान्यनेकशः ॥ ५ ॥
दानवा राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगास्तथा ।
न तान् बलस्थान् बाल्येऽपि जघ्नुर्भरतसत्तम ॥ ६ ॥
वे दानव, राक्षस, दुष्ट गन्धर्व, सर्प तथा अन्यान्य मनुष्यभक्षी जीवोंका बारम्बार संहार करने लगे। भरतश्रेष्ठ! वे बचपनमें भी इतने बलवान् थे कि दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा सर्प उनका बाल बाँका तक नहीं कर पाते थे ॥ ५-६ ॥
जनमेजय उवाच
देवदानवसङ्घानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ।
मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम् ॥ ७ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सम्भवं कृत्स्नमादितः ।
प्राणिनां चैव सर्वेषां सम्भवं वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥
जनमेजय बोले—भगवन्! मैं देवता, दानवसमुदाय, गन्धर्व, अप्सरा, मनुष्य, यक्ष, राक्षस तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। आप कृपा करके आरम्भसे ही इन सबकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन कीजिये ॥ ७-८ ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।
सुरादीनामहं सम्यग् लोकानां प्रभवाप्ययम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—अच्छा, मैं स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा एवं नारायणको नमस्कार करके तुमसे देवता आदि सम्पूर्ण लोगोंकी उत्पत्ति और नाशका यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ९ ॥
ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः ।
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥ १० ॥
ब्रह्माजीके मानस पुत्र छः महर्षि विख्यात हैं—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु ॥ १० ॥
मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात् तु इमाः प्रजाः ।
प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश ॥ ११ ॥
मरीचिके पुत्र कश्यप थे और कश्यपसे ही ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। (ब्रह्माजीके एक पुत्र दक्ष भी हैं) प्रजापति दक्षके परम सौभाग्यशालिनी तेरह कन्याएँ थीं ॥ ११ ॥
अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा ।
क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः ॥ १२ ॥
कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत ।
एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ! उनके नाम इस प्रकार हैं—अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा (क्रूरा), प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और कद्रू। भारत! ये सभी दक्षकी कन्याएँ हैं। इनके बल-पराक्रमसम्पन्न पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है ॥ १२-१३ ॥
अदित्यां द्वादशादित्याः सम्भूता भुवनेश्वराः ।
ये राजन् नामतस्तांस्ते कीर्तयिष्यामि भारत ॥ १४ ॥
अदितिके पुत्र बारह आदित्य हुए, जो लोकेश्वर हैं। भरतवंशी नरेश! उन सबके नाम तुम्हें बता रहा हूँ— ।। १४ ।। धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥ १५ ॥ एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः ॥ १६ ॥ धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। इन सब आदित्योंमें विष्णु छोटे हैं; किंतु गुणोंमें वे सबसे बढ़कर हैं ।। १५-१६ ।। एक एव दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुः स्मृतः । नाम्ना ख्यातास्तु तस्येमे पञ्च पुत्रा महात्मनः ॥ १७ ॥ दितिका एक ही पुत्र हिरण्यकशिपु अपने नामसे विख्यात हुआ। उस महामना दैत्यके पाँच पुत्र थे ।। १७ ।। प्रह्लादः पूर्वजस्तेषां संह्रादस्तदनन्तरम् । अनुह्रादस्तृतीयोऽभूत् तस्माच्च शिबिबाष्कलौ ॥ १८ ॥ उन पाँचोंमें प्रथमका नाम प्रह्लाद है। उससे छोटेको संह्राद कहते हैं। तीसरेका नाम अनुह्राद है। उसके बाद चौथे शिबि और पाँचवें बाष्कल हैं ।। १८ ।। प्रह्लादस्य त्रयः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत । विरोचनश्च कुम्भश्च निकुम्भश्चेति भारत ॥ १९ ॥ भारत! प्रह्लादके तीन पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं। उनके नाम ये हैं—विरोचन, कुम्भ और निकुम्भ ।। १९ ।। विरोचनस्य पुत्रोऽभूद् बलिरेकः प्रतापवान् । बलेश्च प्रथितः पुत्रो बाणो नाम महासुरः ॥ २० ॥ विरोचनके एक ही पुत्र हुआ, जो महाप्रतापी बलिके नामसे प्रसिद्ध है। बलिका विश्वविख्यात पुत्र बाण नामक महान् असुर है ।। २० ।। रुद्रस्यानुचरः श्रीमान् महाकालेति यं विदुः । चतुस्त्रिंशद् दनोः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत ॥ २१ ॥ जिसे सब लोग भगवान् शंकरके पार्षद श्रीमान् महाकालके नामसे जानते हैं। भारत! दनुके चौंतीस पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं ।। २१ ।। तेषां प्रथमजो राजा विप्रचित्तिर्महायशाः । शम्बरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः ॥ २२ ॥ असिलोमा च केशी च दुर्जयश्चैव दानवः । अयःशिरा अश्वशिरा अश्वशंकुश्च वीर्यवान् ॥ २३ ॥
तथा गगनमूर्धा च वेगवान् केतुमांश्च सः ।
स्वर्भानुरश्वोऽश्वपतिर्वृषपर्वाजकस्तथा ॥ २४ ॥
अश्वग्रीवश्च सूक्ष्मश्च तुहुण्डश्च महाबलः ।
इषुपादेकचक्रश्च विरूपाक्षो हराहरौ ॥ २५ ॥
निचन्द्रश्च निकुम्भश्च कुपटः कपटस्तथा ।
शरभः शलभश्चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा ।
एते ख्याता दनोर्वंशे दानवाः परिकीर्तिताः ॥ २६ ॥
उनमें महायशस्वी राजा विप्रचित्ति सबसे बड़ा था। उसके बाद शम्बर, नमुचि, पुलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय, अयःशिरा, अश्वशिरा, पराक्रमी अश्वशंकु, गगनमूर्धा, वेगवान्, केतुमान्, स्वर्भानु, अश्व, अश्वपति, वृषपर्वा, अजक, अश्वग्रीव, सूक्ष्म, महाबली तुहुण्ड, इषुपद, एकचक्र, विरूपाक्ष, हर, अहर, निचन्द्र, निकुम्भ, कुपट, कपट, शरभ, शलभ, सूर्य और चन्द्रमा हैं। ये दनुके वंशमें विख्यात दानव बताये गये हैं ॥ २२—२६ ॥
अन्यौ तु खलु देवानां सूर्याचन्द्रमसौ स्मृतौ ।
अन्यौ दानवमुख्यानां सूर्याचन्द्रमसौ तथा ॥ २७ ॥
देवताओंमें जो सूर्य और चन्द्रमा माने गये हैं, वे दूसरे हैं और प्रधान दानवोंमें सूर्य तथा चन्द्रमा दूसरे हैं ॥ २७ ॥
इमे च वंशाः प्रथिताः सत्त्ववन्तो महाबलाः ।
दनुपुत्रा महाराज दश दानववंशजाः ॥ २८ ॥
महाराज! ये विख्यात दानववंश कहे गये हैं, जो बड़े धैर्यवान् और महाबलवान् हुए हैं। दनुके पुत्रोंमें निम्नांकित दानवोंके दस कुल बहुत प्रसिद्ध हैं— ॥ २८ ॥
एकाक्षो मृतपा वीरः प्रलम्बनर्कावपि ।
वातापी शत्रुतापनः शठश्चैव महासुरः ॥ २९ ॥
गविष्ठश्च वनायुश्च दीर्घजिह्वश्च दानवः ।
असंख्येयाः स्मृतास्तेषां पुत्राः पौत्राश्च भारत ॥ ३० ॥
एकाक्ष, वीर मृतपा, प्रलम्ब, नरक, वातापी, शत्रुतापन, महान् असुर शठ, गविष्ठ, वनायु तथा दानव दीर्घजिह्व। भारत! इन सबके पुत्र-पौत्र असंख्य बताये गये हैं ॥ २९-३० ॥
सिंहिका सुषुवे पुत्रं राहुं चन्द्रार्कमर्दनम् ।
सुचन्द्रं चन्द्रहर्तारं तथा चन्द्रप्रमर्दनम् ॥ ३१ ॥
सिंहिकाने राहु नामक पुत्रको उत्पन्न किया, जो चन्द्रमा और सूर्यका मान-मर्दन करनेवाला है। इसके सिवा सुचन्द्र, चन्द्रहर्ता तथा चन्द्रप्रमर्दनको भी उसीने जन्म दिया ॥ ३१ ॥
क्रूरस्वभावं क्रूरायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।
गणः क्रोधवशो नाम क्रूरकर्मारिमर्दनः ॥ ३२ ॥
क्रूरा (क्रोधा)-के क्रूर स्वभाववाले असंख्य पुत्र-पौत्र उत्पन्न हुए। शत्रुओंका नाश करनेवाला क्रूरकर्मा क्रोधवश नामक गण भी क्रूराकी ही संतान हैं ॥ ३२ ॥ दनायुषः पुनः पुत्राश्चत्वारोऽसुरपुङ्गवाः । विक्षरो बलवीरौ च वृत्रश्चैव महासुरः ॥ ३३ ॥ दनायुके असुरोंमें श्रेष्ठ चार पुत्र हुए—विक्षर, बल, वीर और महान् असुर वृत्र ॥ ३३ ॥ कालायाः प्रथिताः पुत्राः कालकल्पाः प्रहारिणः । प्रविख्याता महावीर्या दानवेषु परंतपाः ॥ ३४ ॥ कालाके विख्यात पुत्र अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करनेमें कुशल और साक्षात् कालके समान भयंकर थे। दानवोंमें उनकी बड़ी ख्याति थी। वे महान् पराक्रमी और शत्रुओंको संताप देनेवाले थे ॥ ३४ ॥ विनाशनश्च क्रोधश्च क्रोधहन्ता तथैव च । क्रोधशत्रुस्तथैवान्ये कालकेया इति श्रुताः ॥ ३५ ॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्ता तथा क्रोधशत्रु। कालकेय नामसे विख्यात दूसरे-दूसरे असुर भी कालाके ही पुत्र थे ॥ ३५ ॥ असुराणामुपाध्यायः शुक्रस्त्वृषिसुतोऽभवत् । ख्याताश्चोशनसः पुत्राश्चत्वारोऽसुरयाजकाः ॥ ३६ ॥ असुरोंके उपाध्याय (अध्यापक एवं पुरोहित) शुक्राचार्य महर्षि भृगुके पुत्र थे। उन्हें उशना भी कहते हैं। उशनाके चार पुत्र हुए, जो असुरोंके पुरोहित थे ॥ ३६ ॥ त्वष्टाधरस्तथात्रिश्च द्वावन्यौ रौद्रकर्मिणौ । तेजसा सूर्यसंकाशा ब्रह्मलोकपरायणाः ॥ ३७ ॥ इनके अतिरिक्त त्वष्टाधर तथा अत्रि ये दो पुत्र और हुए, जो रौद्र कर्म करने और करानेवाले थे। उशनाके सभी पुत्र सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्मलोकको ही परम आश्रय माननेवाले थे ॥ ३७ ॥ इत्येष वंशप्रभावः कथितस्ते तरस्विनाम् । असुराणां सुराणां च पुराणे संश्रुतो मया ॥ ३८ ॥ राजन्! मैंने पुराणमें जैसा सुन रखा है, उसके अनुसार तुमसे यह वेगशाली असुरों और देवताओंके वंशकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बताया है ॥ ३८ ॥ एतेषां यदपत्यं तु न शक्यं तदशेषतः । प्रसंख्यातुं महीपाल गुणभूतमनन्तकम् ॥ ३९ ॥ तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च तथैव गरुडारुणौ । आरुणिर्वारुणिश्चैव वैनतेयाः प्रकीर्तिताः ॥ ४० ॥ महीपाल! इनकी जो संतानें हैं, उन सबकी पूर्णरूपसे गणना नहीं की जा सकती; क्योंकि वे सब अनन्त गुने हैं। तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, आरुणि तथा वारुणि—ये
विनताके पुत्र कहे गये हैं ॥ ३९-४० ॥
शेषोऽनन्तो वासुकिश्च तक्षकश्च भुजङ्गमः ।
कूर्मश्च कुलिकश्चैव काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः ॥ ४१ ॥
शेष, अनन्त, वासुकि, तक्षक, कूर्म और कुलिक आदि नागगण कद्रूके पुत्र कहलाते हैं ॥ ४१ ॥
भीमसेनोग्रसेनौ च सुपर्णो वरुणस्तथा ।
गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च सप्तमः ॥ ४२ ॥
सत्यवागर्कपर्णश्च प्रयुतश्चापि विश्रुतः ।
भीमश्चित्ररथश्चैव विख्यातः सर्वविद् वशी ॥ ४३ ॥
तथा शालिशिरा राजन् पर्जन्यश्च चतुर्दशः ।
कलिः पञ्चदशस्तेषां नारदश्चैव षोडशः ।
इत्येते देवगन्धर्वा मौनेयाः परिकीर्तिताः ॥ ४४ ॥
राजन्! भीमसेन, उग्रसेन, सुपर्ण, वरुण, गोपति, धृतराष्ट्र, सातवें सूर्यवर्चा, सत्यवाक्, अर्कपर्ण, विख्यात प्रयुत, भीम, सर्वज्ञ और जितेन्द्रिय चित्ररथ, शालिशिरा, चौदहवें पर्जन्य, पंद्रहवें कलि और सोलहवें नारद—ये सब देवगन्धर्व जातिवाले सोलह पुत्र मुनिके गर्भसे उत्पन्न कहे गये हैं ॥ ४२—४४ ॥
अथ प्रभूतान्यन्यानि कीर्तयिष्यामि भारत ।
अनवद्यां मनुं वंशामसुरां मार्गणप्रियाम् ॥ ४५ ॥
अरूपां सुभगां भासीमिति प्राधा व्यजायत ।
सिद्धः पूर्णश्च बर्हिश्च पूर्णायुश्च महायशाः ॥ ४६ ॥
ब्रह्मचारी रतिगुणः सुपर्णश्चैव सप्तमः ।
विश्वावसुश्च भानुश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा ॥ ४७ ॥
इत्येते देवगन्धर्वाः प्राधेयाः परिकीर्तिताः ।
इमं त्वप्सरसां वंशं विदितं पुण्यलक्षणम् ॥ ४८ ॥
प्राधासूत महाभागा देवी देवर्षितः पुरा ।
अलम्बुषा मिश्रकेशी विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा ॥ ४९ ॥
अरुणा रक्षिता चैव रम्भा तद्वन्मनोरमा ।
केशिनी च सुबाहुश्च सुरता सुरजा तथा ॥ ५० ॥
सुप्रिया चातिबाहुश्च विख्यातौ च हाहा हूहूः ।
तुम्बुरुश्चेति चत्वारः स्मृता गन्धर्वसत्तमाः ॥ ५१ ॥
भारत! इसके अतिरिक्त अन्य बहुत-से वंशोंकी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ। प्राधा नामवाली दक्षकन्याने अनवद्या, मनु, वंशा, असुरा, मार्गणप्रिया, अरूपा, सुभगा और भासी इन कन्याओंको उत्पन्न किया। सिद्ध, पूर्ण, बार्हि, महायशस्वी पूर्णायु, ब्रह्मचारी, रतिगुण,
सातवें सुपर्ण, विश्वावसु, भानु और दसवें सुचन्द्र—से दस देव-गन्धर्व भी प्राधाके ही पुत्र बताये गये हैं। इनके सिवा महाभागा देवी प्राधाने पहले देवर्षि (कश्यप)-के समागमसे इन प्रसिद्ध अप्सराओंके शुभ लक्षणवाले समुदायको उत्पन्न किया था। उनके नाम ये हैं—अलम्बुषा, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तिलोत्तमा, अरुणा, रक्षिता, रम्भा, मनोरमा, केशिनी, सुबाहु, सुरता, सुरजा और सुप्रिया। अतिबाहु, सुप्रसिद्ध हाहा और हूहू तथा तुम्बुरु—ये चार श्रेष्ठ गन्धर्व भी प्राधाके ही पुत्र माने गये हैं ॥ ४५–५१ ॥
अमृतं ब्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
अपत्यं कपिलायास्तु पुराणे परिकीर्तितम् ॥ ५२ ॥
अमृत, ब्राह्मण, गौएँ, गन्धर्व तथा अप्सराएँ—ये सब पुराणमें कपिलाकी संतानें बतायी गयी हैं ॥ ५२ ॥
इति ते सर्वभूतानां सम्भवः कथितो मया ।
यथावत् सम्परिख्यातो गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ ५३ ॥
भुजङ्गानां सुपर्णानां रुद्राणां मरुतां तथा ।
गवां च ब्राह्मणानां च श्रीमतां पुण्यकर्मणाम् ॥ ५४ ॥
राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बताया है। इसी तरह गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, सुपर्णों, रुद्रों, मरुद्गणों, गौओं तथा श्रीसम्पन्न पुण्यकर्मा ब्राह्मणोंके जन्मकी कथा भी भलीभाँति कही है ॥ ५३-५४ ॥
आयुष्यश्चैव पुण्यश्च धन्यः श्रुतिसुखावहः ।
श्रोतव्यश्चैव सततं श्राव्यश्चैवानसूयता ॥ ५५ ॥
यह प्रसंग आयु देनेवाला, पुण्यमय, प्रशंसनीय तथा सुननेमें सुखद है। मनुष्यको चाहिये कि वह दोषदृष्टि न रखकर सदा इसे सुने और सुनावे ॥ ५५ ॥
इमं तु वंशं नियमेन यः पठेन्
महात्मनां ब्राह्मणदेवसंनिधौ ।
अपत्यलाभं लभते स पुष्कलं
श्रियं यशः प्रेत्य च शोभनां गतिम् ॥ ५६ ॥
जो ब्राह्मण और देवताओंके समीप महात्माओंकी इस वंशावलीका नियमपूर्वक पाठ करता है, वह प्रचुर संतान, सम्पत्ति और यश प्राप्त करता है तथा मृत्युके पश्चात् उत्तम गति पाता है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आदित्यादिवंशकथने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आदित्यादिवंशकथनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन
षट्षष्टितमोऽध्यायः
महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः ।
एकादश सुताः स्थाणोः ख्याताः परमतेजसः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ब्रह्माके मानस पुत्र छः महर्षियोंके नाम तुम्हें ज्ञात हो चुके हैं। उनके सातवें पुत्र थे स्थाणु। स्थाणुके परम तेजस्वी ग्यारह पुत्र विख्यात हैं ॥ १ ॥
मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः ।
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतपः ॥ २ ॥
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः ।
स्थाणुर्भवश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः ॥ ३ ॥
मृगव्याध, सर्प, महायशस्वी निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, शत्रुसंतापन पिनाकी, दहन, ईश्वर, परम कान्तिमान् कपाली, स्थाणु और भगवान् भव—ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं ॥ २-३ ॥
मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
षडेते ब्रह्मणः पुत्रा वीर्यवन्तो महर्षयः ॥ ४ ॥
मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु—ये ब्रह्माजीके छः पुत्र बड़े शक्तिशाली महर्षि हैं ॥ ४ ॥
त्रयस्त्वङ्गिरसः पुत्रा लोके सर्वत्र विश्रुताः ।
बृहस्पतिरुतथ्यश्च संवर्तश्च धृतव्रताः ॥ ५ ॥
अत्रेस्तु बहवः पुत्राः श्रूयन्ते मनुजाधिप ।
सर्वे वेदविदः सिद्धाः शान्तात्मानो महर्षयः ॥ ६ ॥
अंगिराके तीन पुत्र हुए, जो लोकमें सर्वत्र विख्यात हैं। उनके नाम ये हैं—बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त। ये तीनों ही उत्तम व्रत धारण करनेवाले हैं। मनुजेश्वर! अत्रिके बहुत-से पुत्र सुने जाते हैं। वे सब-के-सब वेदवेत्ता, सिद्ध और शान्तचित्त महर्षि हैं ॥ ५-६ ॥
राक्षसाश्च पुलस्त्यस्य वानराः किन्नरास्तथा ।
यक्षाश्च मनुजव्याघ्र पुत्रास्तस्य च धीमतः ॥ ७ ॥
नरश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुलस्त्य मुनिके पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर तथा यक्ष हैं ॥ ७ ॥
पुलहस्य सुता राजञ्छरभाश्च प्रकीर्तिताः ।
सिंहाः किम्पुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ॥ ८ ॥
राजन्! पुलहके शरभ, सिंह, किम्पुरुष, व्याघ्र, रीछ, और ईहामृग (भेड़िया) जातिके पुत्र हुए ॥ ८ ॥
क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः ।
विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपरायणाः ॥ ९ ॥
क्रतु (यज्ञ)-के पुत्र क्रतुके ही समान पवित्र, तीनों लोकोंमें विख्यात, सत्यवादी, व्रतपरायण तथा भगवान् सूर्यके आगे चलनेवाले साठ हजार वालखिल्य ऋषि हुए ॥ ९ ॥
दक्षस्त्वजायताङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् भगवानृषिः ।
ब्रह्मणः पृथिवीपाल शान्तात्मा सुमहातपाः ॥ १० ॥
भूमिपाल! ब्रह्माजीके दाहिने अँगूठेसे महातपस्वी शान्तचित्त महर्षि भगवान् दक्ष उत्पन्न हुए ॥ १० ॥
वामादजायताङ्गुष्ठाद् भार्या तस्य महात्मनः ।
तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनयन्मुनिः ॥ ११ ॥
इसी प्रकार उन महात्माके बायें अँगूठेसे उनकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ। महर्षिने उसके गर्भसे पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं ॥ ११ ॥
ताः सर्वास्त्वनवद्याङ्ग्यः कन्याः कमललोचनाः ।
पुत्रिकाः स्थापयामास नष्टपुत्रः प्रजापतिः ॥ १२ ॥
वे सभी कन्याएँ परम सुन्दर अंगोंवाली तथा विकसित कमलके सदृश विशाल लोचनोंसे सुशोभित थीं। प्रजापति दक्षके पुत्र जब नष्ट हो गये, तब उन्होंने अपनी उन कन्याओंको पुत्रिका बनाकर रखा (और उनका विवाह पुत्रिकाधर्मके अनुसार ही किया*) ॥ १२ ॥
ददौ स दश धर्माय सप्तविंशतिमिन्दवे ।
दिव्येन विधिना राजन् कश्यपाय त्रयोदश ॥ १३ ॥
राजन्! दक्षने दस कन्याएँ धर्मको, सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको और तेरह कन्याएँ महर्षि कश्यपको दिव्य विधिके अनुसार समर्पित कर दीं ॥ १३ ॥
नामतो धर्मपत्न्यस्ताः कीर्त्यमाना निबोध मे ।
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया तथा ॥ १४ ॥
बुद्धिर्लज्जा मतिश्चैव पत्न्यो धर्मस्य ता दश ।
द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वयम्भुवा ॥ १५ ॥
अब मैं धर्मकी पत्नियोंके नाम बता रहा हूँ, सुनो—कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति—ये धर्मकी दस पत्नियाँ हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने इन सबको धर्मका द्वार निश्चित किया है अर्थात् इनके द्वारा धर्ममें प्रवेश होता है ॥ १४-१५ ॥
सप्तविंशतिः सोमस्य पत्न्यो लोकस्य विश्रुताः । कालस्य नयने युक्ताः सोमपत्न्यः शुचिव्रताः ॥ १६ ॥ चन्द्रमाकी सत्ताईस स्त्रियाँ समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। वे पवित्र व्रत धारण करनेवाली सोमपत्नियॉं काल-विभागका ज्ञापन करनेमें नियुक्त हैं ॥ १६ ॥
सर्वा नक्षत्रयोगिन्यो लोकयात्राविधानतः । पैतामहो मुनिर्देवस्तस्य पुत्रः प्रजापतिः । तस्याष्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥ १७ ॥ धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १८ ॥ लोक-व्यवहारका निर्वाह करनेके लिये वे सब-की-सब नक्षत्र-वाचक नामोंसे युक्त हैं। पितामह ब्रह्माजीके स्तनसे उत्पन्न होनेके कारण मुनिवर धर्मदेव उनके पुत्र माने गये हैं। प्रजापति दक्ष भी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं। दक्षकी कन्याओंके गर्भसे धर्मके आठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्हें वसुगण कहते हैं। अब मैं वसुओंका विस्तारपूर्वक परिचय देता हूँ। धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं ॥ १७-१८ ॥
धूम्नायास्तु धरः पुत्रो ब्रह्मविद्यो ध्रुवस्तथा । चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वासायाः श्वसनस्तथा ॥ १९ ॥ रतायाश्चाप्यहः पुत्रः शाण्डिल्याश्च हुताशनः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च प्रभातायाः सुतौ स्मृतौ ॥ २० ॥ धर और ब्रह्मवेत्ता ध्रुव धूम्राके पुत्र हैं। चन्द्रमा मनस्विनीके और अनिल श्वासाके पुत्र हैं। अह रताके और अनल शाण्डिलीके पुत्र हैं तथा प्रत्यूष और प्रभास ये दोनों प्रभाताके पुत्र बताये गये हैं ॥ १९-२० ॥
धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा । ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः ॥ २१ ॥ धरके दो पुत्र हुए—द्रविण तथा हुतहव्यवह। सब लोकोंको अपना ग्रास बनानेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र हैं ॥ २१ ॥
सोमस्य तु सुतो वर्चा वर्चस्वी येन जायते । मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ॥ २२ ॥
सोमके मनोहरा नामक स्त्रीके गर्भसे प्रथम तो वर्चा नामक पुत्र हुआ, जिससे लोग वर्चस्वी (तेज, कान्ति और पराक्रमसे सम्पन्न) होते हैं, फिर शिशिर, प्राण तथा रमण नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥
अह्नः सुतस्तथा ज्योतिः शमः शान्तस्तथा मुनिः ।
अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्छरवणालयः ॥ २३ ॥
अहके चार पुत्र हुए—ज्योति, शम, शान्त तथा मुनि। अनलके पुत्र श्रीमान् कुमार (स्कन्द) हुए, जिनका जन्मकालमें सरकंडोंके वनमें निवास था ॥ २३ ॥
तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजः ।
कृत्तिकाभ्युपपत्तेश्च कार्तिकेय इति स्मृतः ॥ २४ ॥
शाख, विशाख और नैगमेय*—ये तीनों कुमारके छोटे भाई हैं। छः कृत्तिकाओंको मातारूपमें स्वीकार कर लेनेके कारण कुमारका दूसरा नाम कार्तिकेय भी है ॥ २४ ॥
अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः ।
अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ २५ ॥
अनिलकी भार्याका नाम शिवा है। उसके दो पुत्र हैं—मनोजव तथा अविज्ञातगति। इस प्रकार अनिलके दो पुत्र कहे गये हैं ॥ २५ ॥
प्रत्युषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्नाथ देवलम् ।
द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ ।
बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी ॥ २६ ॥
योगसक्ता जगत् कृत्स्नमसक्ता विचचार ह ।
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह ॥ २७ ॥
देवल नामक सुप्रसिद्ध मुनिको प्रत्यूषका पुत्र माना जाता है। देवलके भी दो पुत्र हुए। वे दोनों ही क्षमावान् और मनीषी थे। बृहस्पतिकी बहिन स्त्रियोंमें श्रेष्ठ एवं ब्रह्मवादिनी थीं। वे योगमें तत्पर हो सम्पूर्ण जगत्में अनासक्त भावसे विचरती रहीं। वे ही वसुओंमें आठवें वसु प्रभासकी धर्मपत्नी थीं ॥ २६-२७ ॥
विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः ।
कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः ॥ २८ ॥
शिल्पकर्मके ब्रह्मा महाभाग विश्वकर्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। वे सहस्रों शिल्पोंके निर्माता तथा देवताओंके बढ़ई कहे जाते हैं ॥ २८ ॥
भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः ।
यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह ॥ २९ ॥
वे सब प्रकारके भूषणोंको बनानेवाले और शिल्पियोंमें श्रेष्ठ हैं। उन्होंने देवताओंके असंख्य दिव्य विमान बनाये हैं ॥ २९ ॥