महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदा धारयितुं शेकुः संक्रान्तां दानवैर्बलात् ॥ ३८ ॥ ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता । जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ॥ ३९ ॥ सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः । ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ॥ ४० ॥ दानवोंने बलपूर्वक जिसपर अधिकार कर लिया था, पर्वतों और वृक्षोंसहित उस पृथ्वीको उस समय कच्छप और दिग्गज आदिकी संगठित शक्तियाँ तथा शेषनाग भी धारण करनेमें समर्थ न हो सके। महीपाल! तब असुरोंके भारसे आतुर तथा भयसे पीड़ित हुई पृथ्वी सम्पूर्ण भूतोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें उपस्थित हुई। ब्रह्मलोकमें जाकर पृथ्वीने उन लोकस्रष्टा अविनाशी देव भगवान् ब्रह्माजीका दर्शन किया, जिन्हें महाभाग देवता, द्विज और महर्षि घेरे हुए थे ॥ ३८—४० ॥
गन्धर्वैरप्सतेभिश्च देवकर्मसु निष्ठितैः । वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ॥ ४१ ॥ देवकर्ममें संलग्न रहनेवाले अप्सराएँ और गन्धर्व उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करते थे। पृथ्वीने उनके निकट जाकर प्रणाम किया ॥ ४१ ॥
अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी । संनिधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ॥ ४२ ॥ तत् प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयम्भुवः । पूर्वमेवाभवद् राजन् विदितं परमेष्ठिनः ॥ ४३ ॥ भारत! तदनन्तर शरण चाहनेवाली भूमीने समस्त लोकपालोंके समीप अपना सारा दुःख ब्रह्माजीसे निवेदन किया। राजन्! स्वयम्भू ब्रह्मा सबके कारणरूप हैं, अतः पृथ्वीका जो आवश्यक कार्य था वह उन्हें पहलेसे ही ज्ञात हो गया था ॥ ४२-४३ ॥
स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्बुध्येत भारत । ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम् ॥ ४४ ॥ भारत! भला जो जगत्के स्रष्टा हैं, वे देवताओं और असुरोंसहित समस्त जगत्का सम्पूर्ण मनोगत भाव क्यों न समझ लें ॥ ४४ ॥
तामुवाच महाराज भूमिं भूमिपतिः प्रभुः । प्रभवः सर्वभूतानामीशः शम्भुः प्रजापतिः ॥ ४५ ॥ महाराज! जो इस भूमिके पालक और प्रभु हैं, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा समस्त प्राणियोंके अधीश्वर हैं, वे कल्याणमय प्रजापति ब्रह्माजी उस समय भूमिसे इस प्रकार बोले ॥ ४५ ॥
ब्रह्मोवाच