महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोष्वश्वेषु च राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिषेषु च । क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ॥ ३० ॥ जातैरिह महीपाल जायमानैश्च तैर्मही । न शशाकात्मनाऽऽत्मानमियं धारयितुं धरा ॥ ३१ ॥ राजेन्द्र! गौओं, घोड़ों, गदहों, ऊँटों, भैंसों, कच्चे मांस खानेवाले पशुओं, हाथियों और मृगोंकी योनिमें भी यहाँ असुरोंने जन्म लिया और अभीतक वे जन्म धारण करते जा रहे थे। उन सबसे यह पृथ्वी इस प्रकार भर गयी कि अपने-आपको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ३०-३१ ॥
अथ जाता महीपालाः केचिद् बहुमदान्विताः । दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोक इह च्युताः ॥ ३२ ॥ वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् । इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ॥ ३३ ॥ स्वर्गसे इस लोकमें गिरे हुए तथा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए कितने ही दैत्य और दानव अत्यन्त मदसे उन्मत्त रहते थे। वे पराक्रमी होनेके साथ ही अहंकारी भी थे। अनेक प्रकारके रूप धारण कर अपने शत्रुओंका मान-मर्दन करते हुए समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर विचरते रहते थे ॥ ३२-३३ ॥
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ्छूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् । अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ॥ ३४ ॥ वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंको भी सताया करते थे। अन्यान्य जीवोंको भी अपने बल और पराक्रमसे पीड़ा देते थे ॥ ३४ ॥
त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते । विचेरुः सर्वशो राजन् महीं शतसहस्रशः ॥ ३५ ॥ राजन्! वे असुर लाखोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे और समस्त प्राणियोंको डराते-धमकाते तथा उनकी हिंसा करते हुए भूमण्डलमें सब ओर घूमते रहते थे ॥ ३५ ॥
आश्रमस्थान् महर्षींश्च धर्षयन्तस्ततस्ततः । अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदबलेन च ॥ ३६ ॥ वे वेद और ब्राह्मणके विरोधी, पराक्रमके नशेमें चूर तथा अहंकार और बलसे मतवाले होकर इधर-उधर आश्रमवासी महर्षियोंका भी तिरस्कार करने लगे ॥ ३६ ॥
एवं वीर्यबलोत्सिक्तैर्भूरियन्तैर्महासुरैः । पीड्यमाना मही राजन् ब्रह्माणमुपचक्रमे ॥ ३७ ॥ राजन्! जब इस प्रकार बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त महादैत्य विशेष यत्नपूर्वक इस पृथ्वीको पीड़ा देने लगे, तब यह ब्रह्माजीकी शरणमें जानेको उद्यत हुई ॥ ३७ ॥
न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् ।